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पांच

पांच एक संख्या है। यह चार के बाद और छह के पहले वाली संख्या है। भारतीय दर्शन परम्परा में पांच का बहुत महत्व है। इसके महत्व का अंदाजा इन शब्दों से लगाया जा सकता है - पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेंन्द्रियां, पंचप्राण, पंच स्कन्ध, पंच तन्मात्र, पंच पवित्र, पंच मकार, पंचायतन, पांच गुण, पांच पद, पांच ध्यानी बुद्ध, उनकी पांच शक्तियां, पांच कुल, पांच आनन्द, पांच आकाश, पंचेन्द्रिय, पंच तत्व, पांच कुटुम्ब, पांच कुल, पांच भुजंग, आदि, जिनका प्रयोग भारतीय दर्शन एवं चिंतन परम्परा में संतों ने व्यापर रूप से किया है।

भारतीय संतों ने पांच शब्द का प्रयोग अनेक रहस्यमयी तरीकों से किया है जो अनायास ही साधकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। उदाहरण के लिए कबीर की एक साखी लें -
कबीर पांच पखेरुवा राखे पोख लगाइ।
एक जु आयो पारधी लगै गयो सभै उड़ाय।।

कबीर कहते हैं कि पांच पखेरुओं को साधक ने कुंभक में बंद कर दिया था, परन्तु एक जो पारधी (साधक) आया तो वह पांचों पखेरुओं का उड़ाकर ले गया। ये पांच पखेरुए हैं - पंच प्राण, अर्थात् प्राण, अपान, व्यन, उदान और समान, जिन्हें प्राणायाम कर साधक ने कुम्भक में बंद कर दिया था।

कबीर का दूसरा उदारहण भी लें -
कागद केरी नावरी पानी केरी गंग।
कहै कबीर कैसे तिरुं, पंच कुसंगी संग।।

गंगा का पानी है और कागज की नाव है। ऐसे में कबीर कहते हैं कि कैसे तिरुं, क्योंकि साथ में पांच कुसंगी हैं (अर्थात् पांच ज्ञानेन्द्रियां हैं), जो भटकाती हैं।

Page last modified on Wednesday August 19, 2026 15:42:37 UTC : Initial version