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पाखण्ड

पाखण्ड या पाखंड व्यक्ति का वह व्यवहार है जो दिखाता कुछ और है परन्तु वास्तव में उसके पीछे होता कुछ और है। उदारहण के लिए किसी विधर्मी का तिलक लगाकर धार्मिक होने का प्रदर्शन करना पाखंड है। पाखण्ड करने वाले व्यक्ति को पाखण्डी कहा जाता है।

अनेक पुराने ग्रंथों में पाषण्ड शब्द का उल्लेख मिलता है जिसे पाखण्ड पढ़ा जाता है। पाषण्ड पाषाण शब्द से बना है। प्राचीन काल में कुछ ब्राह्मणों का उल्लेख मिलता है जो पाषाण लेकर घूमते थे जिसमें खुदे हुए पटचित्र होते थे जिसमें स्वर्ग की सुखमय झांकियां चित्रित रहती थीं। इसी पाषाण को दिखाकर वे लोगों को कर्मकाण्ड की ओर आकर्षित करते थे। इसलिए इन पाषाणों को लेकर घुमने वाले ब्राह्मणों को पाषण्डी कहा गया। नख पाषण्ड ब्राह्मणों का जिक्र भी पुराने ग्रंथों में मिलता है। अशोक के शासनकाल में पाषण्ड धार्मिक सम्प्रदाय का भी उल्लेख मिलता है जिनके साधुओं को उन्होंने बड़ा आदर और दान दिया था। बौद्ध और जैन सम्प्रदायों में भी प्रचीन काल में पाषण्डियों का उल्लेख मिलता है। परन्तु उस समय पाषण्डी का अर्थ आदरसूचक था। गोरखनाथ ने भी पाषण्ड नाम वाले योगियों का आदर किया था।

परन्तु समय बीतने के साथ ही पाषण्डियों के प्रति लोगों का आदर भाव खत्म होता चला गया, क्योंकि पाषण्डी स्वयं के लाभ में अधिक रुचि लेने लगे थे तथा लोगों को ठगने लगे थे। लगभग आठवीं सदी के के आसपास जब बौद्ध और जैन धर्मों का लोगों में प्रभाव घटने लगा और भागवत धर्म की पुनर्स्थापना होने लगी तब पाखंड शब्द का अर्थ भी बदलने लगा, और इसका अर्थ छद्म धर्मिक व्यवहार हो गया। सोलहवीं सदी आते आते इसक अर्थ तो कपट, छल, या धोखा ही हो गया। तुलसीदास ने इन्हीं अर्थों में पाखण्ड शब्द का उपयोग अपनी रचना राम चरित मानस में किया है।

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