पाठालोचन
पाठालोचन किसी भी साहित्यिक कृति की वह विवेचना पद्धति है जिसमें उपलब्ध लिखित पाठ के आधार, विशेषकर तब जबकि पहली प्रति उपलब्ध न हो, यह निर्धारित करने की कोशिश की जाती है कि मूल पाठ क्या रहा होगा। विवेचना करने वाले उपलब्ध प्रतियों या प्रतिलिपियों के पाठों की तुलना कर उनकी त्रुटियों को दूर करने की कोशिश करते हैं। अंग्रेजी में इसे टेक्सचुअल क्रिटिसिज्म के नाम से जाना जाता है।ध्यान रहे कि अनेक पुरानी कृतियों की मूल प्रति उपलब्ध नहीं होती। आधुनिक मुद्रण से पहले कृतियों की अन्य लोग लिखकर प्रतियां/ प्रतिलिपियां तैयार करते थे, और इस क्रम में प्रतियां तैयार करने वाले भी उसमें कुछ जोड़ते, घटाते या सम्पादित करते थे। अनेक हस्तलिखित प्रतियों में कुछ भाग गायब भी मिलते थे। कई बार रचनाकार के निर्देशन में उनकी रचनाओं का प्रकाशन नहीं होता और तब भी मूल पाठ में बदलाव कर उसे प्रकाशित भी कर दिया जाता है। ऐसी स्थितियों में पाठालोचन की आवश्यकता उत्पन्न होती है ताकि इस बात का निर्धारण किय जा सके कि रचना का वास्तविक पाठ क्या रहा होगा और किन कारणों से वैसा रहा होगा।
पाठालोचन में रचना के वास्तविक पाठ का निर्धारण और कई बार पुनर्निर्माण भी होता है। परन्तु वास्तविक पाठ दो प्रकार का हो सकता है - पहला, रचनाकार द्वारा लिपिबद्ध, और दूसरा रचनाकार जो कहना चाहते थे उसे दूसरों द्वारा लिखा गया। इन दोनों वास्तविक पाठों में अन्तर को स्पष्ट करने के लिए भी पाठालोचन का उपयोग किया जता है। अन्य लेखक भी अपने लेखन में किसी रचना का उदाहरण देते हैं, अनुवाद करते हैं, संकलन में प्रकाशित करते हैं, विवेचना करते हैं, या किसी अन्य तरह से सामग्री प्रस्तुत करते हैं। इनके कारण भी मूल पाठ के संदर्भ में भ्रम की स्थिति है जाती है। इनके संदर्भ में स्पष्टीकरण के लिए भी पाठालोचन का उपयोग किया जाता है।