पारद
पारद का अर्थ है पारा। पारद का अत्यंत चंचल माना गया है और इसलिए संत साहित्य में अनेक स्थानों पर मन को भी पारद कहा गया है। हठयोग में भी मन को पारद कहा गया है। लेकिन प्रचीन काल से ही रसायन या औषधि के रूप में पारद का प्रयोग किया जाता रहा है।पारद के महत्व को प्रचीन भारतीय हठयोग के रसेश्वर दर्शन अत्यंत प्रतिष्ठा मिली। उसमें पारद को शिव का वीर्य और अभ्रक को पार्वती का रज माना गाया है। बताया गया है कि पारद और अभ्रक से जो रसायन तैयार होते हैं वे व्याधियां ही दूर नहीं करते परन्तु मृत्यु से भी बचा लेते हैं। इस अर्थ में इसे मृत्युनाशक भी कहा गया। कहा गया कि इसके शुद्ध प्रयोग से अशक्त शरीर वाले की शक्ति लौट जाती है।
हठयोग में इसे अमरत्व प्रदान करने वाला भी बताया गया परन्तु उसमें पारद किसी भिन्न अर्थ में प्रयुक्त हुआ लगता है। उसमें प्राण की तरह ही पारद की भी तीन अवस्थाएं बतायी जाती हैं - मूर्छित, मृत, और बद्ध। शिव-पार्वती संवाद में एक बार शिव ने पार्वती से कहा था कि कर्मयोग से शरीर धारण किया जा सकता है। उन्होंने कर्मयोग के दो प्रकार बताए थे - रसमूलक तथा वायु या प्राण मूलक । व्यक्ति की मूर्छित अवस्था में रस और वायु व्याधियों को दूर करते हैं, मृत अवस्था में जीवन देते हैं, और बद्ध होने पर अमर बना देते हैं।