पिंड
पिंड मानव शरीर को कहा गया है। भारतीय योग और तंत्र पद्धतियों में इसकी परिकल्पना ब्रह्मांड के प्रतिरूप के रुप में की गयी है। इस तरह जो ब्रह्मांड में है वही पिंड में है ऐसा माना गया है। ब्रह्मांड में सूर्य की स्थिति मानव के नाभिमूल में, चन्द्रमा की स्थिति तालुमूल में, इड़ा या ललना को गंगा, पिंगला या रसना को यमुना, और सुषुम्ना या अवधूतिका को सरस्वती माना गया है। सन्तों ने सारे ग्रहों, नक्षत्रों, नदियों, पर्वतों, आकाश आदि सभी की स्थिति पिंड के अन्दर मानी है। उन्होंने कहा है कि सारे तीर्थ भी इसी पिंड में हैं। कैलाश और मानसरोवर जैसे तीर्थ भी इसी के अन्दर हैं। तालुमूल स्थित चन्दमा से जो अमृत झरता है उसे नाभि मूल में सूर्य सोख लेता है, और योगी को इसी को रोकना होता है और इसी अमृत को पीकर वह परमतत्व को प्राप्त करता है। सन्तों का कहना है कि सारा असली संसार तो पिंड में ही है और बाह्य संसार माया या मिथ्या है।