पिड़िया
पिड़िया भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, और झारखंड के बिहार की सीमा से लगे इलाकों में कुंवारी कन्याओं द्वारा किया जाने वाला एक व्रत है। यह कार्तिक शुक्लपक्ष प्रतिपद् के दिन से शुरु होकर अगहन शुक्ल प्रतिपद तक एक माह चलता है। पहले दिन गोधन की गोबर की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है, और उसी गोबर में से थोड़ा अंश लेकर कुंवारी लड़कियां पिड़िया लगाती हैं। पिड़िया गोबर के छोटे-छोटे पिंडों को कहते हैं। घर की किसी दीवार पर गोबर की छोटी-छोटी सैकड़ों मनुष्य की आकृतियां बनायी जाती हैं। इसी को पिड़िया लगाना कहा जाता है। साथ में आटे को पानी में घोलकर ऐपन के द्वारा दीवार पर चित्र भी बनाये जाते हैं। इस व्रत में बहनें अपने भाईयों के लिए मंगलाकामनाएं करती हैं, प्रतिदिन पिड़िया की कथा सुनती हैं, पिड़िया के गीत गाती हैं, और उसके बाद ही कुछ खाती हैं। पिड़िया के गीतों में भाई-बहन के बीच के अलौकिक और स्वाभाविक प्रेम का वर्णन होता है। अन्तिम दिन नये चावल और गुड़ से खीर बनायी जाती है जिसे वे खाती हैं। इस खीर को रसिआव कहते हैं।