भ्रमर
भ्रमर का सामान्य अर्थ है भौंरा। यह उड़ने वाला एक कीट है, जिसकी पीठ काले-पीले रंग की चौड़ी पट्टियां होती हैं। इसके छोटे-छोटे पंख होते हैं। एक वयस्क भ्रमर का आकार अंगुठे के आधे अग्रभाग के बराबर होता है। यह मधुमक्खी की प्रजाति का ही कीट है। ये फूलों पर मंडराते हैं और उनके अंदर के रस चूसते हैं, जिसके कारण परागण में उनका बहुत योगदान होता है।चूंकि भ्रमर फूलों पर मंडराते हैं और उनपर जा बैठते हैं क्योंकि उन्हें मकरन्द प्रिय है। वह एक ही फूल तक सीमित नहीं रहते। यही कारण है कि साहित्य में कवियों ने उसे चंचल मन के रसिक नायक का प्रतीक माना है। इसे चंचल मन का भी प्रतीक माना गया है जो विषयों में ही अनुरक्त रहता है, और इसके कारण वही कमल फूल के अन्दर भी कैद हो जाता है।
भारतीय योग और तंत्र परम्परा में साधक के मन को भी भ्रमर कहा गया है, क्योंकिशरीर के भीतर स्थित ऊर्जा केंद्रों या चक्रों को भी 'कमल' के रूप में दर्शाया गया है। ब्रह्मरंध्र को इसी कारण भ्रमर-गुफा भी कहा गया है, जो चेतना की एक अवस्था हैं जिसमें पहुंचकर साधक या योगी को बाहरी प्रकाश या ध्वनि का बोध समाप्त हो जाता है तथा आंतरिक शून्य व शांति का अनुभव होता है।