भ्रमरगीत
श्रीमद्भागवत में गोपियों द्वारा कृष्ण के वियोग में भ्रमर की अन्योक्ति के सहारे गाये गये अत्यंत लतित एवं मर्मस्पर्शी गीतों को भ्रमरगीत कहा गया है। कथा है कि उद्धव कृष्ण के दूत बनकर गोपियों को समझाने ब्रज (वृंदावन/गोकुल) जाते हैं, जहां गोपियां उन्हें धूर्त (कृष्ण) के बन्धु मधुकर (भौंरा) कहकर सम्बोधित करती हैं, क्योंकि भ्रमर को चंलल मन का रसिक नायक कहा गया है जो किसी एक फूल से तृप्त नहीं होता। एक गोपी के पास एक भौंरे का मंडराना ही ऐसे सम्बोधन का कारण बन जाता है। फिर गोपियां मधुकर को लक्ष्य कर प्रेम भरे उपालम्भ से कृष्ण के कपट-प्रेम, निष्ठुरता, क्रूरता, अकृतज्ञता, अव्यवस्थित चित्त और विरक्ति के आलोचना उदाहरण देकर करने लगीं और इस प्रकार विपरीत व्यंजना से अनन्य कृष्ण भक्ति के गीत गाये। इसी कारण इन्हें भ्रमर गीत कहा गया। कृष्ण और उद्धव दोनों को गोपियों ने भ्रमर कहा।भक्ति आन्दोलन के कृष्ण काव्य में प्रायः सभी कृष्ण भक्त कवियों ने भ्रमरगीत गाये। विद्यापति की पदावली में कुछ पद हैं जिनमें विरहिणी राध मधुकर को सम्बोधित करके कृष्ण की निष्ठुरता का प्रेममय उलाहना देती है। परन्तु हिन्दी साहित्य में सूरदास को भ्रमरगीत परम्परा का प्रवर्तक माना जाता है। सूरसागर के भ्रमरगीत विख्यात हैं, जिनके दो पक्ष हैं - काव्य पक्ष और धार्मिक पक्ष।
सूरदास के बाद अष्टछाप के एक अन्य कवि नन्ददास ने भी भंवरगीतों की रचना की। उनकी छन्द शैली सूरदास की तरह की ही है परन्तु उनमें पुष्टिमार्ग के भक्ति सिद्धान्त तथा उसका दार्शनिक पक्ष अत्यधिक मुखर है। अन्य अष्टछाप कवियों द्वारा भी भ्रमरगीत की रचना का उल्लेख मिलता है, जिसमें कृष्णदास का नाम विशेष रूप से लिया जाता है, परन्तु उनकी रचनाएं सम्यक प्रबंध के रूप मे नहीं मिलतीं।
भ्रमरगीत रचना की परम्परा रीतिकाल (लगभग सन 1650 ईस्वी से 1857 ईस्वी) और बाद में आधुनिक काल तक मिलती है।