मंडलचक्र
भारतीय तन्त्र साधना में गुह्य अनुष्ठानों में ब्रह्मांड के प्रतीक के रूप में जो वृत्त बनाया जाता है उसे मंडलचक्र कहा जाता है। माना जाता है कि मंडलचक्र के केन्द्र में ब्रह्मांडीय ऊर्जा संकेन्द्रित रहती है। हिन्दू धर्म के शैव और शाक्त तथा बौद्ध धर्म की वज्रयान तंत्र साधना में इसका उपयोग किया जाता है। इसमें अनेक तरह की ज्यामितीय आकृतियां जैसे वृत्त, वर्ग, त्रिकोण, और कमल की पंखुड़ियां चित्रित की जाती हैं। इसे रंगीन रेत, चूर्ण (जैसे सिंदूर, हल्दी), चावल के आटे या कभी-कभी कीमती धातुओं और पत्थरों से जमीन या वेदी पर बनाया जाता है। उनमें देवताओं का आह्वान किया जाता है, और साधक को विभिन्न आकृतियों पर ध्यान केन्द्रित करने को कहा जाता है और उसे दीक्षित किया जाता है।इस तरह की बाह्य साधना के अलावा आन्तरिक साधना में भी मंडलचक्र की परिकल्पना की गयी और शरीर के अन्दर ही मंडलचक्र माना गया। साधक को बाह्य मंडल कर्मों से विमुक्त होकर स्वयं की काया में शून्य और वज्र का युगनद्ध सम्पन्न कर मण्डल स्थापित करने को कहा जाता है। यह मण्डलकर्म पवन या श्वास के निरोध की प्रक्रिया से सम्पन्न किया जाता है।