मंत्रयान
मंत्रयान बौद्ध धर्म के तीसरे यान या मार्ग वज्रयान का ही एक नाम है। दो अन्य मार्ग हैं हीनयान और महायान। इसे मंत्रयान इसलिए कहा गया क्योंकि इसमें तन्त्र साधना का विधान है और मंत्रों का प्रयोग किया जाता है। इसे तांत्रिक बौद्ध धर्म भी कहा जाता है। तत्वरत्नावली के अनुसार मंत्रयान महायान के दो अंगों में से एक है। दूसरा है पारमितायान।मंत्रयान का उद्गम शून्यवाद के सूक्ष्म विवेचन से माना जाता है। उपदेशों को सूत्रों में कहा गया ताकि अनुयायी उसे आसानी से स्मरण रख सकें, और कहा गया कि उनके बार-बार उच्चारण करने से निर्वाण अर्थात् शून्य की प्राप्ति हो सकती है। उन्हें धरणी नाम दिया गया, और उनके और भी छोटे रूपों को मंत्र कहा गया। मंत्रयान को तंत्रयान की पहली सीढ़ी माना जाता है। गुप्त अक्षरों के समूह को धरणी कहते हैं और वहीं से मंत्र विकसित हुए।
बौद्ध धर्म में शून्य सिद्धांत का प्रतिपादन नागार्जुन ने लगभग 100 ई. के आसपास किया था, परन्तु इसमें तंत्रयान का समावेश असंग ने किया जो नागार्जुन के ही समकालीन थे। इसमें मंत्रों और तंत्रों का व्यापक प्रयोग हुआ। यह ज्ञात नहीं है कि बौद्ध धर्म में मंत्र का सबसे पहले प्रयोग किसने किया, परन्तु यह कहा जा सकता है कि ईसा से बाद की पहली शताब्दी में प्रयोग शुरु हो गया था। अर्थहीन मंत्रों में ही वास्तविक शक्ति मानी गयी। मंत्रयान में मुद्रा का भी समावेश हुआ।
पूर्वी भारत में पालवंशी राजाओं के शासनकाल में नागार्जुन के शून्य को ही वज्र कहा गया और इस तरह इस मार्ग का नाम वज्रयान पड़ा। बाद में इसे कालचक्रयान या सहजयान भी कहा गया।
कालचक्रयान में आदि बुद्ध का सिद्धांत लगभग 10वीं शताब्दी में शामिल किया गया, जिसमें आदि बुद्ध और शक्ति अर्थात् काली के मिलन से संसार की उत्पत्ति मानी गयी। ध्यान की मुद्रा में आदि बुद्ध सम्भर या डाकिनी जैसी भयंकर शक्तियों को उत्पन्न करते हैं, जिसके कारण ही इसे कालचक्रयान कहा गया। कालचक्र का अर्थ है समय का चक्र।
इसमें पांच ध्यानी बुद्ध - वैरोचन, रत्नसंभव, अमिताभ, अमेघसिद्धि, तथा अक्षोभ्य - और उनकी शक्ति तारा से संसार की उत्पत्ति मानी जाती है। ध्यानी बुद्ध और तारा के मिलन से ही सारे देवी-देवताओं की उत्पत्ति मानी गयी।
मंत्रयान के साहित्य संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषओं में पाये जाते हैं।