मतंग
मतंग मतवाले हाथी को कहते हैं। संत साहित्य में उन्मत्त मन को मतंग कहा गया है, जो बिना अंकुश के महावत अर्थात स्वयं को कष्ट पहुंचाता है। जिस प्रकार महावत हाथी को अंकुश से वश में रखता है, उसी तरह व्यक्ति भी अंकुश से ही मन को बश में रख सकता है, अन्यथा मन दुखदायी ही होता है। कबीरदास के एक दोहे में कहा गया है -मन मतंग गइयर हने, मनसा भई सचान।
जंत्र-मंत्र माने नहीं, लागी उड़ि-उड़ि खान॥
कबीर का कहना है कि मनुष्य का मन पागल या मतवाले हाथी जैसा है। यह शरीर रूपी महावत को भी कष्ट देता है या उसपर हावी हो जाता है। बेलगाम मन और इच्छा को ज्ञान से ही नियंत्रित किया जा सकता है।