मद
मद एक संचारी भाव है। इसकी उत्पत्ति मद्य के सेवन से मानी गयी है और इसलिए इसे मद नाम दिया गया। विश्वनाथ ने भरत के नाट्यशास्त्र के आधार पर कहा है कि जिसमें सम्मोहन और आनन्द का मिश्रण हो वह मद की अवस्था है। धनंजय ने अपने दशरूपक में कहा कि मद्यपान से प्रदुर्भूत हर्ष के मद कहते हैं, उसमें अंग, वचन और गति का स्खलन होता है, अर्थात् उनपर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता। हिन्दी के रीतिकालीन कवियों में मद्यपान को भी मद की उत्पत्ति का कारण माना और धन, यौवन, रूप, और प्रभुता आदि को भी। इस तरह रीतिकाल में मद के अर्थ में विस्तार हुआ। ऐसा माना गया कि मद में लोग बहकी-बहकी बातें करते हैं, जैसे प्रेम के आवेग में प्रेमी करते हैं। गर्व और अभिमान में भी लोग अनियंत्रित ढंग से बातें करने लगते हैं। किसी को धन का मद हो जाता है तो किसी को पद, या सत्ता का मद।