प्रदर्शनकारियों ने पुलिस के वाहन फूंक दिएं। हालांकि सम्मेलन के अंदर प्रदर्शनकारियों की चाहतों पर चर्चा संभवतः नहीं हुई, परंतु विश्व के प्रमुख देशों के नेताओं के लिए इसमें कुछ साफ संदेश छिपे थे और उन्होंने स्वयं अपने भाषणों और निर्णयों द्वारा प्रकारांतर से प्रदर्शनकारियों की चिंताओं को सही साबित किया।
आखिर कौन थे ये प्रदर्शनकारी? इनमें पश्चिमी देशों के वे लोग थे, जिनकी नौकरियां चलीं गईं, या आय घटने से जिनका जीवन यापन कठिन हो गया है, या जो सामाजिक अशांति के शिकार हैं, या फिर इसमें वे लोग शामिल थे, जो दुनिया के प्रमुख देशों के नेताओं की आर्थिक एवं सामाजिक नीतियों को विश्व के लिए अहितकर मानते हैं। सम्मेलन के पूर्व विभिन्न संगठन अपने ब्लॉग एवं वेबसाइटों पर इन नेताओं के रवैये का विरोध कर रहे थे। प्रदर्शनों के दौरान भी इनका यही कहना था कि अगर ये नेता विश्व को आर्थिक चुनौतियों से निदान ही नहीं दिला सकते तो फिर सम्मेलन पर इतनी भारी धनराशि क्यों खर्च की जा रही है। अगर सम्मेलन के दौरान नेताओं के भाषणों एवं अंत में जारी 27 पृश्ठों वाले घोषणापत्र को देखें तो विरोधियों की बातों में ज्यादा दम नजर आएगा। वास्तव में सम्मेलन का उद्देश्य तो आर्थिक मंदी से निपटने से लेकर आर्थिक विकास सुनिश्चित करने, वित्तीय बाजार के लिए नियम निर्धारित करने, गरीबी उन्मूलन, भूखमरी रोकने एवं जलवायु परिवर्तन का निदान ढूंढने ....तक काफी व्यापक था, लेकिन परिणामों के स्तर पर देखें तो इनमें से किसी पर एक राय नहीं बनी। यह कहना ज्यादा सही होगा कि सारे नेता बिना कोई ठोस बाध्यकारी फैसला किए टोरंटो से लौट गए।
वर्तमान संकट एवं चुनौतियों से भरे विश्व के लिए यह परिणति चिंताजनक है। वस्तुतः इस समय विश्व अत्यंत कठिन दौर से गुजर रहा है। हर देश अपनी आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों मे उलझा है और इससे बाहर निकलकर सोचने में उसे घर का संकट बढ़ने का खतरा नजर आता है। पहले अपने घर का आग बुझाएं या दूसरे का यह प्रश्न सबके मनोविज्ञान पर हाबी है। हालांकि यह खुली अर्थव्यवस्था और भूमंडलीकरण की सोच के विपरीत है। सिद्धांत रूप में ये विश्व की चुनौतियों एवं संकटों को साझी मानती हैंे और साझे समाधान की कल्पना भी इनमें निहित हैं, पर व्यावहार में चुनौतियों के विश्लेषण एवं समाधान पर एकमत नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यूं ही संरक्षणवाद के खतरे के प्रति आगाह नहीं किया। घबराहट में प्रमुख देशों के अंदर अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षा देने के नाम पर ऐसे कदमों की वकालत की जा रही है जो मुक्त अर्थव्यवस्था के मूल सिद्धांतों के ही विरुद्ध हैं।
मसलन, रोजगार को दूसरे देशों के नागरिकों के लिए कठिन या असंभव बना देना, अपने देश के निर्यात पर कर कम करना एवं आयात को हातोत्साहित लगाना, बाहरी देशों में आउटसोर्सिंग को हतोत्साहित करना..आदि। हालांकि मनमोहन सिंह ने समूह 20 के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि इसके प्रयासों से समन्वित नीतिगत कदम उठाए गए, जिनसे 2008 के बाद 1930 की तरह आर्थिक मंदी के खतरे से विश्व बच गया, किंतु उनके इस आकलन से हर कोई सहमत नहीं हो सकता। ज्यादातर देशों ने वित्तीय संस्थाआंें को डूबने से बचाने एवं मूलतः उसके परिणामस्वरुप पैदा आर्थिक संकट से निपटने के लिए प्रोत्साहन पैकेज दिए जिस कारण इनके राजकोष पर बोझ बढ़ा है। समूह आठ एवं समूह 20 ने कुल मिलकार इस पर पिछले दो वर्षों में 12 हजार अरब डॉलर के आसपास खर्च कर दिया है। इससे सरकारों का वित्तीय ढांचा चरमराने लगा है। यूरोप के कई देशों की साख इतनी गिर गई है कि वित्तीय संस्थाएं उनसे ज्यादा ब्याज वसूलने लगीं हैं और इससे उनका राजकोषीय घाटा और बढ़ रहा है।
ऐसी स्थिति में ये कुछ बाध्यकारी फैसला कर भी लेते तो लागू करना संभव नहीं होता। मसलन, समूह 20 ने तीन वर्षों में बजट घाटा आधा करने का फैसला किया है। इसे कहना आसान है, पर इसे पूरा करना टेढ़ी खीर है। हमारे प्रधानमंत्री ने ही कहा कि अभी विश्व की अर्थव्यवस्था नाजुक दौर में है, इसलिए प्रोत्साहन पैकेजों की वापसी में जल्दबाजी न की जाए। टोरंटो में नेतागण इस प्रश्न का ही समाधान नहीं निकाल पाए कि सरकारी खर्चो में कटौती एवं सार्वजनिक क्षेत्र में छंटनी का जो रास्ता यूरोप एवं जापान में अपनाया जा रहा है उससे आर्थिक मंदी केे दावानल से निकलना सही रास्ता होगा, या सरकारी खर्च जारी रखते हुए आर्थिक विकास सुनिश्चित किया जाए। इन दो प्रश्नों पर सीधी खेमेबंदी थी। अमेरिका आर्थिक विकास सुनिश्चित करने पर जोर दे रहा था तो ब्रिटेन, कनाडा जैसे देश घाटा और कर्ज की समस्या को पहले निपटाने की वकलत कर रहे थे। वास्तव में घाटा और कर्ज की समस्या बढ़ने का अर्थ होगा सरकारों का दिवालिया हो जाना। पिछले दो सालों में दुनिया की बड़ी वित्तीय कंपनियों के दिवाला होने का आघात तो सरकारों ने झेला, पर यदि सरकार ही दिवालिया हो जाए तो कौन बचाएगा। यूरोप के कुछ देश दिवालिया होने के कगार पर हैं। इनकी साख बचाना इस समय केवल इन देशों का ही नहीं, यूरोपीय संघ के जर्मनी, फ्रांस एवं ब्रिटेन जैसे प्रमुख देशों की प्राथमिक चिंता है।
इन दुविधाओं के बीच कोई बाध्यकारी फैसला कैसे हो सकता था। हमारे प्रधानमंत्री ने विश्व की अर्थव्यवस्था की गति में सुधार को टिकाऊ, संतुलित और सतत बनाने की चुनौती रेखांकित करते हुए वित्तीय संस्थाओं के संचालन में बुनियादी सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। इससे सहमति तो जताई गई, पर इस दिशा में कदम उठाने पर सहमति नहीं बनी। बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं के कारोबार पर निगरानी के लिए नियम बनाने तथा लेनदेन पर षुल्क लगाने की मांग उठती रही है। ओबामा ने इसकी वकालत की और अमेरिका में वित्तीय सुधार विधेयक पर बहस जारी है लेकिन सम्मेलन में कोई कदम नहीं उठाया गया। आखिर मौजूदा आर्थिक संकट का मुख्य खलनायक बैंक एवं वित्तीय संस्थाएं ही हैं। कर्ज के कारोबार को प्रमुखता देने वाली ये संस्थाएं कर्ज के लिए लोगों, कारोबारियों को लुभाती हैं, कर्ज प्रदान करती हैं, क्रेडिट कार्ड आदि के माध्यम से लोगांे को कर्ज के जाल में फंसाती हैं और इन पर कोई शुल्क भी नहीं है। यह साफ हो गया है कि इन्होंने अपना कारोबार बढ़ाने की लालच में विश्व का सत्यानाश कर दिया। इन्हें नियंत्रित करना तथा इनसे कारोबार के एवज में हल्का कर वसूलना जरुरी है ताकि गरीबी उन्मूलन आदि कार्यक्रम के लिए अतिरिक्त राशि उपलब्ध हो सके, पर ऐसा न हो सका तो इसे क्या कहा जाए। यदि इन्हें ही नियंत्रित नहीं किया जाता तो फिर कोई क्या उम्मीद करे। (संवाद)
समूह 20 के दुविधाग्रस्त नेता दुनिया को संकट से निजात नहीं दिला सकते
अवधेश कुमार - 2010-07-03 09:35 UTC
यह अब एक परंपरा की तरह कायम हो गया है। जहां भी दुनिया के प्रमुख देश विश्व अर्थव्यवस्था पर विचार-विमर्श करने या कुछ निर्णय करने के लिए एकत्रित होते हैं, वहां आयोजन के समानांतर विरोध प्रदर्शन चलते रहते हैं। धीरे-धीरे ये विरोध प्रदर्शन उग्र होते जा रहे हैं। पिछले साल लंदन में हुए समूह आठ एवं समूह 20 सम्मेलन के दौरान जितना उग्र प्रदर्शन हुआ उसे भुलाया नहीं जा सकता। अभी 26-27 जून को टोरंटो में विश्व की आर्थिक महाशक्तियों के संगठन समूह आठ एवं उभरती हुई नई आर्थिक शक्तियों के देश समूह 20 के संयुक्त सम्मेलन के बाहर प्रदर्शनकारियों ने जैसा आक्रामक विरोध किया, वह भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है। उतनी हिसा, तोड़फोड़ और आगजनी की कल्पना कनाडा सरकार को भी नहीं थी। कुछ लोगों को इस शर्त्त पर प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी कि वे शांतिपूर्ण तरीका अपनाएंगे, किंतु ऐसा नहीं हुआ।