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नये साल की चुनौतियां

लोकतंत्र और अर्थतंत्र पर मंडराते रहेंगे खतरे
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-12-31 08:39 UTC
भारी उथल पुथल के साथ वर्ष 2019 बीत गया और अपने पीछे अनेक अनुत्तरित सवालों को छोड़ गया है। अब देखना होगा की इन सवालों के क्या जवाब भविष्य में छिपे हुए हैं। पिछला साल इस सदी के दूसरे दशक का अंतिम साल था। लिहाजा अब हम तीसरे दशक में प्रवेश कर रहे हैं और यह दशक आजाद भारत के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दशक साबित हो सकता है। उस दशक में क्या कुछ होने वाला है उसकी झांकी इस नये साल में ही दिखाई पड़ जाएगी।

संविधान पर नफरती विचारधारा के हमलों का साल

अर्थव्यवस्था के चौपट होने के लिए भी यह साल याद किया जाएगा
अनिल जैन - 2019-12-30 08:30 UTC
वर्ष 2019 को किस खास बात के लिए याद किया जाएगा या इस वर्ष की कौन सी ऐसी बात है जिसकी यादें भारतीय इतिहास में दर्ज हो जाएंगी? यह सवाल जब आज से कुछ सालों के बाद पूछा जाएगा तो जो लोग इस देश से, देश के संविधान से, इस देश की विविधताओं से, इस देश की आजादी के संघर्ष का नेतृत्व करने और कुर्बानी देने वालों से प्यार करते हैं, उनके लिए इस सवाल का जवाब देना बहुत आसान होगा। ऐसे सभी लोगों का यही जवाब होगा कि यह साल भारतीय संविधान पर एक नफरतभरी विचारधारा के क्रूर आक्रमण का साल था। इस आक्रमण से भारतीय संविधान और हमारे स्वाधीनता आंदोलन के तमाम उदात्त मूल्य बुरी तरह लहूलुहान हुए हैं। यही नहीं, यह साल भारतीय अर्थव्यवस्था के अभूतपूर्व रूप से चैपट होने के तौर पर भी याद किया जाएगा। इस साल को चुनाव आयोग, रिजर्व बैंक, न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्थाओं के सरकार के समक्ष समर्पण के लिए तो खास तौर पर याद किया जाएगा।

झारखंड में हार और उसके बाद

दिल्ली में भी एक हारती हुई लड़ाई लड़ रही है भाजपा
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-12-28 12:17 UTC
2014 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद जब भारतीय जनता पार्टी एक के बाद एक तीन विधानसभा चुनाव जीत चुकी थी और जम्मू और कश्मीर में भी उसने बेहद अच्छा प्रदर्शन किया था, तो दिल्ली ने उसके विजयी घोड़े को रोक दिया था। भारतीय जनता पार्टी दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में मात्र तीन पर ही जीत हासिल कर सकी थी जबकि शेष 70 सीटों पर आम आदमी पार्टी ने ऐतिहासिक जीत हासिल कर ली थी। इस बार तो भाजपा 2019 के बाद एक के बाद एक चुनाव हारती जा रही है। हरियाणा में वह बहुमत के आंकड़े को नहीं छू सकी, जबकि वहां उसके विरोधी बुरी तरह विभाजित थे और कांग्रेस भी अन्दरूनी गुटबाजी से ग्रस्त थी। किसी तरह भाजपा ने अपने नेतृत्व में वहां सरकार बना ली, लेकिन उसके कारण उसे अपने नये सहयोगी को भी सत्ता में भागीदारी देनी पड़ रही है। महाराष्ट्र में भी भाजपा को हार का ही सामना करना पड़ा, क्योंकि शिवसेना से गठबंधन के बावजूद उसे मात्र 105 सीटें ही मिल पाईं, जबकि अकेले लड़ने पर उसे 2014 में 122 सीटें मिल गई थीं। झटका देते हुए शिवसेना ने उसे छोड़ दिया और भाजपा आज वहां विपक्ष में है।

कांग्रेस के भोपाल मार्च ने धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक किया

वाम नेता, लेखक और सिविल सोसाइटी ने पूरा समर्थन जताया
एल एस हरदेनिया - 2019-12-27 09:53 UTC
भोपालः मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने मंत्रियों और पार्टी सहयोगियों के सक्रिय सहयोग से नागरिकता संशोधन अधिनियम और एनआरसी के खिलाफ एक बड़ा प्रदर्शन किया। इस शो की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता वाम दल सीपीआई और सीपीएम, और प्रगतिशील लेखक संघ, अखिल भारतीय धर्मनिरपेक्ष मंच और कई स्वतंत्र प्रगतिशील वामपंथी बुद्धिजीवियों सहित कई धर्मनिरपेक्ष संगठनों द्वारा इसका समर्थन किया जाना था।

झारखंड में अहंकार और नफरत का एजेंडा खंड-खंड

धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश काम नहीं आई
अनिल जैन - 2019-12-26 10:29 UTC
झारखंड विधानसभा चुनाव को लेकर तमाम एग्जिट पोल के अनुमान बता रहे थे विधानसभा त्रिशंकु रहेगी और भाजपा सबसे बडी पार्टी के रूप में उभरेगी। संभवतः यही अंदाजा भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी था। इसी आधार पर उम्मीद जताई जा रही थी कि जिस तरह पिछले दिनों हरियाणा में और उससे पहले गोवा में भाजपा ने सरकार बनाई थी, उसी तरह झारखंड में भी उसकी सरकार बन जाएगी। इसीलिए पार्टी की ओर से ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) और झारखंड विकास मोर्चा के नेताओं से बातचीत शुरू हो गई थी। झारखंड के लिए भाजपा के केंद्रीय प्रभारी ओम माथुर और कुछ अन्य नेता भी मतगणना वाले दिन सुबह ही रांची पहुंच गए थे। मतगणना के दौरान शुरुआती दौर में टेलीविजन चैनलों पर भाजपा के तमाम प्रवक्ता कह भी रहे थे कि सबसे बडे दल के रूप में राज्यपाल की ओर से सबसे पहले सरकार बनाने का न्योता भाजपा को ही दिया जाएगा। लेकिन जब दोपहर बाद तस्वीर साफ हो गई और यह भी साफ हो गया कि झारखंड के मतदाताओं ने सूबे की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को इस कडाके की सर्दी में आधी रात तक जागने या तडके नींद से उठने की तकलीफ नहीं दी है। यानी झारखंड मुक्ति मोर्चा जेएमएम, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के महागठबंधन को स्पष्ट बहुमत से ज्यादा सीटें मिल गईं और विधानसभा में अकेले सबसे बडा दल भी जेएमएम ही रहा।

कहाँ गया भाजपा का वसुधैव कुटुम्बकम

भूपेन्द्र गुप्ता - 2019-12-26 09:38 UTC
भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के प्रतिनिधि श्लोक 'वसुधैव कुटुम्बकम' को हमेशा आदर के साथ दोहराया जाता रहा है। भारतीय संस्कृति और धर्म दर्शन की इससे अच्छी अभिव्यक्ति संभव नहीं है।
अयं निजः परो वैति गणना लघुचेतसाम्
उदारचरितानांतु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

झारखंड में भाजपा की हार

बिना कुछ किए वोट पाने की मंशा पूरी नहीं हो सकी
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-12-24 10:12 UTC
इस लेखक ने झारखंड में भाजपा की हार की भविष्यवाणी बहुत पहले कर दी थी। इसका कारण यह था कि वहां का जाति समीकरण भाजपा के खिलाफ था। लगता है भाजपा नेताओं को भी इसका अहसास हो गया था और उन्होंने अपनी इस कमजोरी की ढकने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति तेज कर दी और इस मोर्चे को खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संभाल रखा था। दोनों ने झारखं डमें नौ- नौ चुनावी सभाएं कीं और धारा 370 और राममंदिर पर अपनी सफलता का खूब बखान किया। अमित शाह ने तो 2024 के लोकसभा चुनाव के तक सारे घुसपैठियों को भारत से खदेड़ देने का एलान भी कर दिया। जब वे घुसपैठिया शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उनका मतलब मुस्लिम होता है और इस तरह के बयानों और दावों से हिन्दुओं के सांप्रदायित तुष्टिकरण की कोशिश होती है। ऐसा कर अमित शाह हिन्दुओं का दिल जीतना चाहते थे। लेकिन लगता है कि इसका उलटा ही असर हुआ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने जिस 18 विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी सभाओं को संबोधित किया, उनमें से 16 में भाजपा के उम्मीदवार हार गए।

कामल नाथ ने माफियाओं के खिलाफ धावा बोला

सहकारी समितियां और बिल्डर निशाने पर
एल एस हरदेनिया - 2019-12-23 11:09 UTC
भोपालः मध्य प्रदेश सरकार ने विभिन्न संप्रदायों के माफियाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने घोषणा की है कि वह मध्य प्रदेश को पूर्ण रूप से माफिया मुक्त बनाने के लिए दृढ़ हैं। दिलचस्प यह है कि ऐसा ही एक माफिया ग्रुप एक अर्ध सरकारी संगठन द्वारा चलाया जा रहा है। इस संगठन को सांची दुग्ध संघ के नाम से जाना जाता है- एक सहकारी संगठन, जो व्यक्तिगत ग्राहकों को दूध की आपूर्ति करता है।

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध हुआ विश्वव्यापी

सहनशील राष्ट्र की भारत की छवि को झटका
सात्यकी चक्रवर्ती - 2019-12-21 13:19 UTC
देश भर में नागरिकता संशोधन कानून (नासंका) के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शनों ने अब बड़ी संख्या में शिक्षाविदों, छात्रों और अन्य सार्वजनिक बुद्धिजीवियों की भागीदारी ने एक वैश्विक आयाम प्राप्त कर लिया है। इन प्रदर्शनों में सिर्फ मुस्लिम शामिल नहीं हैं, बल्कि सभी धर्मो के लोग शामिल हैं, हालांकि उस कानून में भेदभाव मुसलमानों के साथ ही किया गया है। भारत की छवि वैश्विक समुदाय में एक धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक रूप से सहिष्णु देश की रही है, लेकिन अब उसे अचानक पता चल रहा है कि सत्तारूढ़ भाजपा के शासन में सांप्रदायिकता और कट्टरता का राज है और महान भारतीय राष्ट्र को हिंदुराष्ट्र के कार्यक्रम के अनुसार बदल दिया जा रहा है।

असम में एनआरसी की कसरतें विफल रहीं

फिर देश भर में उसे दुहराने का पागलपन क्यों?
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-12-20 13:33 UTC
राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी को तैयार कर घुसपैटियों की पहचान करने की कोशिश असम में हो चुकी है। जो लोग उस कोशिश के प्रति बहुत आशावान थे, वे आज निराश हैं और उसे एक विफल प्रयास मान रहे हैं। उन्हें उम्मीद थी कि कम से कम एक करोड़ लोग घुसपैठिये के रूप में सामने आएंगे और कुछ अपवादों को छोड़कर वे सारे के सारे बांग्लादेशी मुसलमान होंगे। लेकिन जब यह कसरत समाप्त हुई, तो पता चला कि मात्र 19 लाख लोग ही ऐसे पाए गए हैं, जिनकी भारतीय नागरिकता संदिग्ध है और उनमें से 70 फीसदी तो हिन्दू ही ही हैं। और जो घुसपैठियों के रूप में पहचान लिए गए हैं, उन्हें भारत से निकाला ही नहीं जा सकता। उन्हें भारत में ही रखना होगा, भले उनके लिए अलग से डिटेंशन कैंप बनाकर उन्हें उनमें रखा जाय, लेकिन इस समाधान के भयानक खतरे हैं।