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ईवीएम और वीवीपीएटी विवाद

बीच का रास्ता अपनाया जाना चाहिए
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-03-30 12:09 UTC
इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन पर छिड़ा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। ईवीएम के खिलाफ मोर्चा निकालने वाले राजनैतिक पार्टियों के नेता अब मशीनो से की गई मतगणना के साथ साथ 50 फीसदी वीवीपीएटी पर्चियों की गणना की भी मांग कर रहे हैं। लेकिन यह निर्वाचन आयोग को स्वीकार नहीं है। आयोग ने पिछले महीनों कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान प्रत्येक विधानसभा के एक एक बूथ के वीवीपीएटी पर्चियों की गिनती की थी और उनका मशीनों से हुई गिनती का मिलान किया था। मिलान शत प्रतिशत सफल रहा। किसी बूथ की वीवीपीएटी पर्चियों की गणना की जाय, इसके लिए आयोग लाॅटरी का सहारा लेता है। लाॅटरी में जो बूथ आता है, उसकी पर्चियों की गणना की जाती है और देखा जाता है कि मशीन से जो आंकड़े प्राप्त हुए थे, उससे इसके आंकड़े मिलते हैं या नहीं। अब तक जितने भी बूथों की वीवीपीएट पर्चियों की गिनती हुई है, उन सबके आंकड़े उन्हीं बूथों की मशीनों द्वारा दिए गए आंकड़े से बिल्कुल ही मेल खाते पाए गए हैं।

उम्मीदवारों के चयन में भाजपा को परेशानी

दिग्विजय सिंह के खिलाफ अभी तक कोई नाम तय नहीं
एल. एस. हरदेनिया - 2019-03-29 12:13 UTC
भोपालः हालाँकि कांग्रेस ने भोपाल से दिग्विजय सिंह को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है, लेकिन अब लगता है कि भाजपा को यह सीट कठिन दिखाइ्र पड़ रही है। इसके कारण वह अपना उम्मीदवार यहां से तय नहीं कर पा रही है। भाजपा नेता भोपाल के लिए कई नामों का सुझाव दे रहे हैं, उदाहरण के लिए, वरिष्ठ नेता रघुनंदन शर्मा ने कहा कि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को मैदान में उतारा जाना चाहिए। यह तर्क देते हुए कि अगर भाजपा में शामिल होने के पांच घंटे बाद पार्टी अभिनेत्री जयाप्रदा को पार्टी टिकट दे सकती है, तो साध्वी प्रज्ञा को भोपाल से टिकट देने में क्या परेशानी है, क्योंकि वह तो एक कट्टर राष्ट्रवादी है।

गोवा में चुनौतियों का नया दौर

प्रमोद सावंत को मिला है कांटों का ताज
योगेश कुमार गोयल - 2019-03-28 08:57 UTC
गोवा में मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के निधन के चंद घंटों बाद रातों-रात तत्कालीन विधानसभाध्यक्ष प्रमोद सावंत को मुख्यमंत्री बनाया गया और विधानसभा में बहुमत भी साबित कर दिया गया, उससे भाजपा ने गोवा में नेतृत्व को लेकर मंडराता संकट तो सुलझा लिया लेकिन गोवा के मौजूदा घटनाक्रम को देखें तो राज्य में पार्टी के लिए चुनौतियों तो अभी शुरू हुई है।

क्या आडवाणी ऐसी ही बिदाई के हकदार थे?

बेहतर होता वे खुद राजनीति से रिटायर होने का ऐलान कर देते
अनिल जैन - 2019-03-27 10:15 UTC
आखिरकार लालकृष्ण आडवाणी के संसदीय जीवन और एक तरह से उनके राजनीतिक जीवन पर भारतीय जनता पार्टी के कर्ता-धर्ताओं ने पूर्ण विराम लगा ही दिया। अपने छह दशक के राजनीतिक जीवन में जिन आडवाणी ने अपनी पार्टी के असंख्य लोगों को चुनाव लडाने या न लडाने का फैसला करने में अहम भूमिका निभाई, इस बार उन्हीं आडवाणी का फैसला पार्टी ने कर दिया। उनका टिकट काट दिया गया। टिकट काटने वाले भी और कोई नहीं, वे ही रहे, जिन्हें आडवाणी ने न सिर्फ राजनीति का ककहरा सिखाया बल्कि उनको राष्ट्रीय राजनीति में पहचान भी दिलाई और जरूरत पडने पर उनका और उनके गलत कामों का बचाव भी किया।

भाजपा में उम्मीदवार चयन को लेकर असंतोष

कांग्रेस में भी गुटबाजी, पर स्थिति थोड़ी बेहतर
एल. एस. हरदेनिया - 2019-03-26 10:26 UTC
भोपालः लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों की आंशिक सूची की घोषणा के बाद कांग्रेस और भाजपा दोनों को अंदरूनी विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट-2019

भारतीयों की खुशी पर ‘विकास’ का ग्रहण

अनिल जैन - 2019-03-25 09:51 UTC
हमारे देश में पिछले करीब तीन दशक से यानी जब से नई आर्थिक नीतियां लागू हुई है, तब से सरकारों की ओर से आए दिन आंकडों के सहारे देश की अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश की जा रही है। आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले सर्वे भी अक्सर बताते रहते हैं कि भारत तेजी से आर्थिक विकास कर रहा है और देश में अरबपतियों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। इन सबके आधार पर तो तस्वीर यही बनती है कि भारत के लोग लगातार खुशहाली की ओर बढ रहे हैं। लेकिन हकीकत यह नही है।

जेकेएलएफ पर सरकार का हथौड़ा

अलगाववादियों पर शिकंजा कसना ही होगा
योगेश कुमार गोयल - 2019-03-23 10:26 UTC
पुलवामा आतंकी हमले के बाद घाटी में आतंकियों के पैरोकार बनते रहे अलगाववादियों की कमर तोड़ने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा जो कदम उठाये जा रहे हैं, उनकी जरूरत जम्मू कश्मीर में अमन-चैन की बहाली के लिए लंबे समय से महसूस की जा रही थी। इसी कड़ी में सबसे पहले सरकार द्वारा घाटी के कुछ प्रमुख अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस लेने का अहम फैसला लिया गया था, जिनमें हुर्रियत नेता एसएएस गिलानी, आगा सैय्यद मौसवी, मौलवी अब्बास अंसारी, यासीन मलिक, सलीम गिलानी, शाहिद उल इस्लाम, जफर अकबर भट्ट, नईम अहमद खान, मुख्तार अहमद वाजा, फारूख अहमद किचलू, मसरूर अब्बास अंसारी, अगा सैयद अब्दुल हुसैन, अब्दुल गनी शाह, मोहम्मद मुसादिक भट इत्यादि शामिल थे। इन अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा में 100 से भी ज्यादा सरकारी गाड़ियां और 1000 से ज्यादा पुलिसकर्मी लगे थे और सरकारी खजाने से इनकी सुरक्षा पर हर साल अरबों रुपये लुटाये जा रहे थे।

कश्मीर समस्या के लिए अमेरिका और ब्रिटेन जिम्मेदार

ये दोनों देश कश्मीर में अपना सैनिक अड्डा बनाना चाहते थे
एल एस हरदेनिया - 2019-03-22 08:40 UTC
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी सहित संपूर्ण संघ परिवार जवाहरलाल नेहरू को कश्मीर की समस्या के लिए उत्तरदायी मानते हैं। परंतु कश्मीर समस्या के इतिहास का बारीकी से अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि समस्या को उलझाने मंे ब्रिटेन व अमेरिका द्वारा की साजिशों की निर्णायक भूमिका थी। अमेरिका और ब्रिटेन, और विशेषकर ब्रिटेन यह चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर का पाकिस्तान में विलय हो जाए।

क्या कांग्रेस का खोया हुए वैभव लौटा पाएंगी प्रियंका?

चुनावी अभियान की शुरुआत ज्यादा उम्मीद नहीं जगाती
अनिल जैन - 2019-03-22 08:35 UTC
कांग्रेस की संकट मोचक के तौर पर राजनीति के मैदान में उतारी गईं प्रियंका गांधी औपचारिक तौर पर अपनी पार्टी के लिए चुनाव अभियान पर निकल पडी हैं। कांग्रेस को प्रियंका से सबसे बडी उम्मीद यही है कि वे देश के सबसे बडे सूबे में पार्टी को उसका वह वैभव लौटाने में कामयाब होंगी, जो फिलहाल देश के राजनीतिक इतिहास की किताबों में दर्ज है या फिर पुरानी पीढी के लोगों की यादों के झरोखों में। लेकिन प्रियंका ने जिस तरह से धार्मिक प्रतीकों के सहारे अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की है वह बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं जगाता है, क्योंकि धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल करने में जो महारत भाजपा को हासिल है, उसकी बराबरी न तो कांग्रेस कर सकती है और न ही कोई अन्य पार्टी।

विपक्ष के विभाजन का लाभ भाजपा को

एकता की बात थोथी साबित हुई
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-03-20 10:11 UTC
आखिर वही हुआ जो होना था। तमाम दावों के बावजूद भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों की एकता महज एक राजनैतिक स्टंट साबित हुआ है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कुछ राज्यों में अभी भी एकता, गठबंधन और तालमेल की बात चल रही थी, लेकिन अब देर हो चुका है। गठबंधन से सिर्फ राजनैतिक दलों के वोट ही आपस मे नहीं जुड़ते, बल्कि इसके कारण जो राजनैतिक संदेश फैलते हैं उसके कारण फ्लोटिंग वोटर भी अपनी राय बनाते हैं। हार और जीत मे इन वोटरों की काफी भूमिका होती है। ये जिधर जाते हैं, जीत उन्हीं की होती है।