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चुनाव की लंबी प्रक्रिया उचित नहीं

सभी क्षेत्रों में मतदान कम से कम चरणों में संपन्न होन चाहिए
नंतू बनर्जी - 2019-03-19 11:03 UTC
यह सब 1990 के दशक में मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन के समय शुरू हुआ था। चुनाव के दौरान हिंसा को रोकने के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती करने वाले वह पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे। पहली बार आदर्श आचार संहिता को प्रभावी ढंग से लागू करने, चुनावों में बाहुबल और धन शक्ति पर लगाम लगाने, मामलों को दर्ज करने और मतदान नियमों का पालन नहीं करने के लिए उम्मीदवारों को गिरफ्तार करने और उम्मीदवारों के साथ नापाक गठबंधन करने के लिए अधिकारियों को निलंबित करने का श्रेय श्री शेषण को ही जाता है।

होली के विविध रंग

कहीं चलती हैं लाठियां, कहीं बरसते हैं पत्थर
योगेश कुमार गोयल - 2019-03-18 18:22 UTC
जन चेतना का जागरण पर्व होली हमें परस्पर मेल-जोल बढ़ाने और आपसी वैर भाव भुलाने की प्रेरणा देता है। रंगों के इस पर्व के प्रति युवा वर्ग व बच्चों के साथ-साथ बड़ों में भी अपार उत्साह देखा जाता है। वैसे तो यह त्यौहार देश में होलिका दहन व रंगों के त्यौहार के रूप में ही जाना जाता है लेकिन भारत के विभिन्न भागों में इस पर्व को मनाने के अलग-अलग और बड़े विचित्र तौर तरीके देखने को मिलते हैं। डालते हैं देशभर में होली के विविध रूपों पर नजर।

प्रशांत किशोर का राजनैतिक पतन

उनसे गलती कहां हुई
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-03-16 09:35 UTC
जब प्रशांत किशोर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने जनता दल(यू) का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था, तो चर्चा यह होने लगी थी कि किशोर को नीतीश अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी बनाने जा रहे हैं। वैसे उस दल में अनेक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव हैं, इसलिए एक और उपाध्यक्ष बन जाना कोई खास मायने नहीं रखता। सच तो यह है कि जनता दल (यू) के कितने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और वे कौन कौन हैं, इसकी जानकारी जनता दल(यू) के जानकार कार्यकत्र्ताओं को भी नहीं। प्रदेश स्तर पर तो उनकी संख्या सौ मे पहुंच जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर संख्या कम है, लेकिन कितने लोग उस पद पर हैं, इसकी जानकारी शायद बिहार प्रदेश जनता दल(यू) के उपाध्यक्ष पद पर बैठे सभी लोगों को नहीं होगी।

कांग्रेस से मायावती क्यों डरती है?

अपने राजनैतिक अंत की ओर बढ़ रही हैं बसपा सुप्रीमो
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-03-14 07:51 UTC
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सपा-बसपा गठबंधन का हिस्सा नहीं है, क्योंकि मायावती नहीं चाहती थीं कि कांग्रेस उनके गठबंधन के साथ आए। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने साथ कांग्रेस को भी रखना चाहते थे और इसके लिए त्याग करने को भी तैयार थे। त्याग से उनका मतलब समाजवादी पार्टी का कम सीटों पर लड़ने से था। वैसे उन्होंने त्याग तो मायावती की बसपा के साथ गठबंधन करके भी किया। समाजवादी पार्टी बसपा से बड़ी पार्टी है। चुनाव में उसे बसपा से ज्यादा वोट भी मिले हैं और ज्यादा सीटें भी। लोकसभा चुनाव में बसपा का एक उम्मीदवार भी नहीं जीत पाया था, जबकि समाजवादी पार्टी के पांच उम्मीदवार जीत गए। उसके बाद दो उपचुनावों में भी सपा की जीत हुई। विधानसभा के आम चुनाव में बसपा के मात्र 19 विधायक विधानसभा मे आए, तो समाजवादी पार्टी 47 विधायक सदन के सदस्य बने।

2019 के चुनाव में कांग्रेस को सोनिया की जरूरत

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा के सेवानिवृत होने का यह सही समय नहीं
कल्याणी शंकर - 2019-03-13 19:40 UTC
अपना छठा लोकसभा चुनाव जीतने के लिए पूरी तरह तैयार, 72 वर्षीय कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गांधी के एक बार फिर चुनाव लड़ने पर चल रही अटकलबाजी से समाप्त हो गई है। पिछले एक साल से अफवाहें चल रही थीं कि सोनिया गांधी अपनी अस्वस्थता के कारण सक्रिय राजनीति से हट गई हैं और अपना चार्ज अपने बेटे को पूरी तरह दे चुकी हैं। यह भी कहा जा रहा था कि अपने बेटे राहुल को तो उन्होंने अध्यक्ष पद दे ही दिया है और अब उनकी बेटी प्रियंका गांधी भी सक्रिय राजनीति मंे आ गइ्र हैं, तो फिर अब सोनिया राजनीति को अलविदा कह देंगी।

घोषित हुई चुनाव की तारीखें

पर विपक्षी एकता अभी भी दूर की कौड़ी
उपेन्द्र प्रसाद - 2019-03-12 10:00 UTC
निर्वाचन आयोग ने चुनाव की तारीखें घोषित कर दी हैं और चुनाव में भाजपा को पराजित कर सत्ता से बाहर करने के लिए ताल ठोकने वाले विपक्षी पार्टियों के नेता अभी भी सिर्फ ताल ही ठोंक रहे हैं। इस बात को उनको अहसास बहुत पहले हो चुका है कि बिना विपक्षी एकता के नरेन्द्र मोदी और उनकी भाजपा को सत्ता से बाहर नहीं किया जा सकता, क्योंकि अभी भी देश में नरेन्द्र मोदी सबसे लोकप्रिय नेता हैं। यह सच है कि 2014 जैसी लोकप्रियता अब उनकी नहीं रही और उस चुनाव की सफलता को वे बहुत संभव है कि दुहरा भी नहीं पाएं, लेकिन यह भी सच है कि फिर से सरकार बनाने के लिए 2014 जैसी सफलता जरूरी भी नहीं है। यदि भाजपा को दो सौ सीटें आ गईं और उनके सहयोगी दलों को 40 सीटें भी आ गईं, तो सरकार बनाकर उसे स्थायित्व देने में नरेन्द्र मोदी को बहुत मशक्कत का सामना नहीं करना पड़ेगा।

क्या वाकई भूतिया है राजस्थान विधानसभा

राजस्थान विधानसभा का भूतिया कनैक्शन
योगेश कुमार गोयल - 2019-03-11 10:19 UTC
जिस राजस्थान विधानसभा के भीतर निर्वाचित जनप्रतिनिधि अर्थात् विधायक के रूप में प्रवेश करने के लिए हर पांच साल बाद प्रत्याशियों के बीच जोर आजमाइश होती है, आपको जानकर हैरानी होगी कि उसी विधानसभा को पिछले कई वर्षों से भूतिया माना जाता रहा है। गत वर्ष दिसम्बर माह में नई विधानसभा के गठन के बाद से विधानसभा को अपशकुनी मानने वाले विधायकों को फिर से विधानसभा भवन में भूत का भय सताने लगा है। पिछले साल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले विधानसभा को भूतिया मानने वाले कुछ विधायकों ने तो इस बात पर खासा जोर भी दिया था कि 15वीं विधानसभा के गठन से पहले ही यज्ञ-हवन इत्यादि के जरिये विधानसभा भवन की शुद्धि की जानी चाहिए ताकि सभी 200 विधायक विधानसभा की कार्यवाही में सम्मिलित हो सकें।

आतंक की ‘जमात’ पर सरकारी ताला

अनुचित है इस कदम का विरोध
योगेश कुमार गोयल - 2019-03-08 08:59 UTC
केन्द्र सरकार द्वारा पुलवामा हमले के बाद से ही आतंकवाद पर नकेल कसने के लिए लगातार कड़े कदम उठाए जा रहे है। इसी कड़ी में पहले घाटी में अलगाववादी नेताओं से उनकी सुरक्षा छीनने के बाद अब अलगाववादी संगठन जमात-ए-इस्लामी पर आतंकवाद निरोधक कानून के तहत 5 साल के लिए प्रतिबंध लगाया गया है। इससे पहले भी दशकों पहले दो बार इस संगठन को प्रतिबंधित किया गया था। पहली बार 1975 में जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा इस पर दो साल का प्रतिबंध लगाया गया था और दूसरी बार केन्द्र सरकार द्वारा 1990 में इसे प्रतिबंधित किया गया था, जो दिसम्बर 1993 तक जारी रहा। यह ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की तरह का ऐसा संगठन है, जिसका प्रमुख उद्देश्य राजनीति में भागीदारी करते हुए राज्य में इस्लामी शासन की स्थापना करना माना जाता है।

मुस्लिम राष्ट्रों की महफिल में खुली भारत के ढोल की पोल

विशेष अतिथि बनाकर भी भारत का किया अपमान
अनिल जैन - 2019-03-07 10:22 UTC
पुलवामा में जैश-ए-मुहम्मद के दहला देने वाले फिदायीन हमले के बाद उम्मीद की जा रही थी कि पाकिस्तान की सरजमीं से संचालित हो रहे आतंकवाद के खिलाफ विश्वव्यापी तीखी प्रतिक्रिया होगी। यह सही है कि अमेरिका और रूस सहित दुनिया के तमाम देशों ने पुलवामा हमले की निंदा की है, लेकिन इसके लिए पाकिस्तान को सीधे तौर पर किसी ने जिम्मेदार नहीं ठहराया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी एक सप्ताह की ऊहापोह के बाद जो निंदा प्रस्ताव पारित किया, उसमें पाकिस्तान का कहीं उल्लेख नहीं हुआ। ज्यादातर मुस्लिम राष्ट्र ही नहीं, बल्कि चीन भी पूरी तरह इस समय पाकिस्तान के साथ हैं।

दिग्विजय सिंह के बयानों से भाजपा को फायदा

मध्यप्रदेश के मंत्रियों के गैरजिम्मेदाराना बयानबाजी भी जारी
एल. एस. हरदेनिया - 2019-03-06 16:18 UTC
भोपालः पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और राज्य के दो कैबिनेट मंत्रियों के विवादास्पद बयान ने भाजपा को कांग्रेस पर एक हमला करने का मौका दिया है।