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क्या भाजपा से दूर हो रही है दिल्ली?

विश्वविद्यालय छात्रसंघों के चुनावी नतीजे मोदी के लिए अशुभ
उपेन्द्र प्रसाद - 2017-09-14 11:57 UTC
लगता है दिल्ली भारतीय जनता पार्टी से दूर होती जा रही है। पहले बवाना विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। वहां भाजपा ने दलबदल कराकर आम आदमी पार्टी के एक विधायक को पार्टी में मिला लिया था और उसे ही अपना उम्मीदवार भी बनाया था। दिल्ली नगर निगम के चुनाव में शानदार विजय प्राप्त करने के बाद भाजपा को वहां जीत बहुत आसान लग रही थी। कुछ दिन पहले ही हुए नगर निगम के चुनाव में बवाना विधानसभा क्षेत्र के पड़ने वाले 6 वार्डों में भाजपा को 4 में जीत हासिल हुई थी, लेकिन विधानसभा के उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी न केवल हार गई, बल्कि मतगणना समाप्त होने के कुछ पहले तक कांग्रेस उम्मीदवार से भी पिछड़ते हुए तीसरे स्थान पर आती दिख रही थी और जीत के लिए नहीं, बल्कि किसी तरह दूसरे स्थान पर आने के लिए भाजपा के समर्थक मनौती मांग रहे थे। बहरहाल, मतगणना समाप्त होने तक वे दूसरे स्थान पर आ गए।

भाजपा ने कैबिनेट विस्तार में अपने सहयोगियों को बाहर रखा

राजग सहयोगी सलाह मशविरा से बाहर रखे जाते हैं
कल्याणी शंकर - 2017-09-14 11:54 UTC
मोदी मंत्रिमंडल के ताजा विस्तार में एक महिला को रक्षा मंत्री बनाए जाने की बात तो खूब हो रही है, लेकि इस बात पर चर्चा नहीं हो रही है कि इस बार के विस्तार में राजग सहयोगियों को पूरी तरह बाहर रखा गया है। गौरतलब हो कि राजग में भाजपा सहित कुल 32 पार्टियां शिरकत कर रही हैं और उनमे सभी को मंत्रिपरिषद में स्थान नहीं मिल पाया है।

यौन हिंसा का शिकार बनते मासूम

फिर तो नपुंसक बना डालिए...?
प्रभुनाथ शुक्ल - 2017-09-11 13:13 UTC
देश का सामाजिक भविष्य खतरे में हैं। जिस पीढ़ी पर हमारा भविष्य टिका है, वह तमाम असामाजिक विकृतियों और यौनिक हिंसा की शिकार हो रही है। उसका भविष्य सुरक्षित नहीं है। वह घर में हो या अपने किसी करीबी की गोद में या फिर स्कूल में हर जगह असुरक्षित है। बीमार समाज की विकृत मानसिकता कई सवाल खड़े करती है। जिसकी वजह है कि गुड और बैड टच की बात सामने आने लगी है। इस तरह की व्यवहारिक ज्ञान भी मासूमों को दिया जाने लगा है। मासूमों के प्रति यौन हिंसा रोकने के लिए पास्कों जैसा एक्ट भी बेमतलब साबित हो रहा है। समाज नैतिक पतन की पराकाष्ठा लांघ रहा है। हरियाणा में एक के बाद एक घटनाएं खट्टर सरकार की नाकामी को बंया करती हैं। कानून-व्यवस्था को लेकर राज्य की हाईकोर्ट भी कटघरे में खड़ी कर चुकी है।

विदेशी भाषा अंग्रेजी को आज भी अहमियत क्यों?

हम हिन्दी दिवस के दिन ही हिंदीमय होते हैं
डाॅ. भरत मिश्र प्राची - 2017-09-11 13:11 UTC
हर देश की अपनी एक भाषा होती है । जिसे राष्ट्रभाषा कहा जाता है। यह राष्ट्र की आत्मा होती है। जिसमें पूरा देश संवाद करता है। जिससे राष्ट्र की पहचान होती है । राष्ट्रभाषा से ही किसी देश की पहचान होती है। जो देश की अस्मिता होती है। यहीं भाषा ही देश को एक सूत्र में पिरोती है। जिस देश की अपनी भाषा नहीं, वह अपनी पहचान बनाने में सदा ही विफल रहा है। जिस देश पर शासन करना हो , उस देश की भाषा को पहले नष्ट करपे की परम्परा हर जगह देखी जा सकती है । इसका इतिहास गवाह है कि विश्व के अनेक देश जो अपनी भाषा कायम नहीं कर पाये है आज भी स्वतंत्र होकर गुलामी की जिंदगी जी रहे है, जिनका अस्तित्व सदा खतरे में रहता है।

गौरी लंकेश की हत्या और आरएसएस

संघ के लोगों की टिप्पणियां निंदनीय
एल.एस. हरदेनिया - 2017-09-11 13:08 UTC
‘‘गौरी लंकेश यदि आरएसएस की आलोचना नहीं करती तो वे आज ज़िदा रहती’’, ये शब्द हैं कर्नाटक के भाजपा विधायक के जो उन्होंने गौरी की मृत्यु के दो दिन बाद कहे। इस तरह की बात कहकर भाजपा विधायक ने एक स्पष्ट संदेश दे दिया है कि जो भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आलोचना करेगा उसका हश्र वही होगा जो गौरी लंकेश का हुआ है।

निर्यात और निर्यातकों की परीक्षा की घड़ी

जीएसटी ने उड़ा रखी है उनकी नींद
उपेन्द्र प्रसाद - 2017-09-08 12:14 UTC
देश की आर्थिक विकास दर में मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में भारी गिरावट के बीच निर्यात के आंकड़े भी हमारे देश के लिए परेशानी पैदा करने वाले हैं। डाॅलर में यदि निर्यात की वृद्धि को हम देखें, तो यह विकास दर करीब 3 फीसदी रही, जो पड़ोसी बांग्लादेश की 26 फीसदी विकास दर की तुलना में बहुत ही कम है और यदि इस विकास दर को भारतीय मुद्रा रुपये में देखें, तो निर्यात राजस्व में गिरावट ही हो गई है। यानी रुपये की ईकाई में जुलाई महीने में विकास दर नकारात्मक हो गई है।

न तो मिनिमम गवर्नमेंट, न ही मैक्सिमम गवर्नेंस

प्रधानमंत्री के सर्वशक्तिमान होने की छवि टूटी
अनिल जैन - 2017-09-08 12:11 UTC
‘मिनिमम गवर्नमेंट-मैक्सिमम गवर्नेंस!’ पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी ने अपनी लगभग हर चुनावी रैली में इस सूत्र वाक्य को दोहराया था। उनकी सरकार भी बन गई और उसने अपने कार्यकाल का दो तिहाई समय पूरा भी कर लिया। इस दौरान उन्होंने अपनी मंत्रिपरिषद का तीन मर्तबा विस्तार और फेरबदल भी कर लिया, लेकिन ‘मिनिमम गवर्नमेंट-मैक्सिमम गवर्नेंस’ वाला उनका सूत्र वाक्य भी महज चुनावी जुमला ही साबित हुआ। न तो वे अपनी सरकार का आकार छोटा रख पाए और न ही कामकाज के स्तर पर वैसे परिणाम दे पाए जिसका वायदा उन्होंने सत्ता में आने से पहले किया था। तीसरे विस्तार और फेरबदल के बाद अब उनकी मंत्रिपरिषद में उनके सहित 76 सदस्य हो गए हैं। यह संख्या निर्धारित सीमा से छह कम है, यानी अभी छह मंत्री और बनाए जा सकते हैं।

आपदा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती

मुंबई और ह्यूस्टन का अंतर तो देखिए
कल्याणी शंकर - 2017-09-06 12:55 UTC
टेक्सासः अमेरिका के टेक्सास मे एक सप्ताह मे 50 इंच की बारिश हुई और एकाएक बाढ़ आ गई। इस घटना के कारण टेक्सास ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस तरह की बारिश और बाढ़ वहां 500 सालों के बाद हुई। तूफान ने तो 10 लाख लोगों को अपनी जगह से हट जाने के लिए मजबूर कर दिया। 50 लोग तो उसमें मारे भी गए।

मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार: नीतीश के लिए खतरे की घंटी

उपेन्द्र प्रसाद - 2017-09-05 13:06 UTC
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया और उधर पटना में कयासों का बाजार गर्म हो गया है। मीडिया में अटकलबाजी चल रही थी कि नीतीश कुमार के दल से कम से कम दो सांसद मंत्री बनाए जाएंगे। नीतीश के सबसे ज्यादा विश्वस्त रामचन्द्र प्रसाद का नाम तो तय माना जा रहा था और दूसरे नाम के लिए करीब आधा दर्जन सांसदों के नाम बारी बारी से आ रहे थे। कभी हरिवंश का नाम आ रहा था, तो कभी वशिष्ठ नारायण का नाम लिया जा रहा था। कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर का नाम कुछ ज्यादा लोग ले रहे थे। भ्रष्टाचार के मामले में मुकदमे का सामना कर रहे अनिल सहनी भी एक संभावित मंत्री के तौर पर जाने जा रहे थे। और यदि दूसरे मंत्री के रूप में सबसे ज्यादा नाम किसी का लिया जा रहा था, तो वे थे संतोष कुशवाहा। एक सातवां नाम भी था और वह था नीतीश के दल के मुख्य महासचिव केसी त्यागी का। मीडिया में तो उनका नाम नहीं था, लेकिन उनके समर्थक दावे के साथ उनके मंत्री बनने की बात कर रहे थे।

एक बलात्कारी बाबा के आगे लाचार सत्ता तंत्र

हमारे लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संदेश
अनिल जैन - 2017-09-04 17:47 UTC
बलात्कार के मामले में सजा पाकर जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके धर्मगुरू कहलाने वाले डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के मामले ने एक बार फिर इस हकीकत को उजागर किया है कि हमारे देश में धर्म के नाम पर लोगों की आस्था का शोषण करने वाले लंपट बाबाओं का घिनौना व्यापार किस कदर पनप रहा है और ऐसे बाबाओं को वोटों के लालची सत्ताधारियों का किस कदर संरक्षण हासिल रहता है।