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बिहार में नीतीश की नई सरकार

लालू के साथ निभाना आसान नहीं था
उपेन्द्र प्रसाद - 2017-07-31 13:12 UTC
बिहार में अंततः वही हुआ, जिसे होना था। नीतीश कुमार लालू से अलग हो गए और भाजपा से मिलकर उन्होंने सरकार बना ली। सच कहा जाय, तो इसकी पृष्ठभूमि 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे निकलने के साथ ही तैयार हो गई थी।

सरकार को पब्लिक सेक्टर की कंपनियों को मजबूत करना होगा

अन्यथा दवा मूल्य नियंत्रण आदेश बेमानी हो जाएगा
डाॅक्टर अरुण मित्र - 2017-07-29 11:12 UTC
यह स्तब्ध कर देने वाली बात थी, जब केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने ने एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में कहा कि सरकार दवाइयों की बढ़ी कीमतों की जांच कराएगी। यह मानना बचकाना होगा कि सरकार को यह पता ही नहीं है कि दवाएं महंगी क्यों है। इसके बारे में सरकार को पता था और इसलिए ही उसने 1995 में नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथाॅरिटी का गठन किया था। दवा मूल्य नियंत्रण आदेश, 1995 को ध्यान में रखते हुए इस अथाॅरिटी का गठन किया गया था।

नोबेल विजेता मलाला ने भोपाल की लड़कियों को प्रेरणा दी

जिला अधिकारी की पहल ने रंग दिखाया
एल एस हरदेनिया - 2017-07-28 10:56 UTC
भोपालः पाकिस्तान की मलाला युसूफजई भोपाल की लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं। गौरतलब हो कि मलाला को तालिबान चरमपंथियों ने गोली मार दी थी, क्योंकि वह पढ़ने के लिए स्कूल जाया करती थी। किसी तरह मलाला इलाज के द्वारा बच गई, लेकिन उसके बाद भी उसने स्कूल जाना जारी रखा। उसके साहस से प्रभावित होकर उसे शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया।

बिहार में अनैतिकता का नंगा नाच

लालू, नीतीश और सुशील मोदी हैं इसके लिए जिम्मेदार
एल.एस. हरदेनिया - 2017-07-28 10:49 UTC
पिछले दो-तीन दिनों से बिहार में जो कुछ हुआ है वह अनैतिकता और अवसरवादिता का नंगा नाच है। सच पूछा जाए तो बिहार में संसदीय प्रजातंत्र की मूल आत्मा की सामूहिक हत्या की गई। इस सामूहिक हत्या के तीन मुख्य अपराधी हैं-नीतीश कुमार, लालू यादव और भारतीय जनता पार्टी के सुशील मोदी। पिछले तीन दिनों में इन तीनों नेताओं ने जो कुछ किया उसे जानकर और सुनकर उन लोगों का सिर शर्म से झुक गया है, जो राजनीति में नैतिकता के समर्थक हैं।

संकेत जो नए राष्ट्रपति के भाषण से निकले

अपेक्षा पर खरे नहीं उतरे कोविंद
अनिल जैन - 2017-07-27 11:03 UTC
भारत के चैदहवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण करने के बाद रामनाथ कोविंद ने अपने लिखित भाषण के जरिये देश और दुनिया के बारे में अपनी समझ स्पष्ट करने की कोशिश की, जो कि राष्ट्रपति के तौर उनसे अपेक्षित थीं। लेकिन ऐसा करते हुए वे अपनी राजनीतिक और वैचारिक प्रतिबद्धता से ऊपर उठने की उदारता नहीं दिखा पाए जिसकी कि अपेक्षा राष्ट्रपति पद संभालने वाले किसी भी व्यक्ति से की जाती है। राष्ट्रपति पद के चुनाव में कोविंद बेशक भारतीय जनता पार्टी और उसके गठबंधन के उम्मीदवार थे। इससे पहले भाजपा की सरकार ने ही उन्हें राज्यपाल भी बनाया था और उससे भी पहले वे लंबे समय तक भाजपा के माध्यम से राजनीति में सक्रिय थे। लेकिन उनके राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उनसे अपेक्षा थी कि वे अपने दलीय और वैचारिक लगाव से ऊपर उठकर देश से संवाद करेंगे, लेकिन अफसोस कि वे ऐसा नहीं कर सके।

अस्तित्व की जंग लड़ रहे हैं लालू प्रसाद

लालू और नीतीश कुमार के रिश्ते में उतार-चढ़ाव आते रहे हैं
कल्याणी शंकर - 2017-07-26 09:57 UTC
बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को चारो ओर से बांध दिया गया है। लेकिन, क्या इसका अर्थ यह है कि उनका राजनैतिक जीवन समाप्त हो गया है? अदालती फैसलों और सजाओं के बाद भी उन्होंने राजनीति में आस्तित्व अपना बचा लिया है, लेकिन लोग फैसला सुनाए जा रहे हैं। एक बार नहीं, बल्कि कई बार प्रादेशिक और राष्ट्रीय, दोनों स्तरों की राजनीति में फिर से उभर कर उन्होंने लोगों को चैंकाया है। रेल मंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके इस व्यक्ति के लिए आने वाले कुछ महीने उनकी बच निकलने की उनकी क्षमता की परीक्षा के हैं क्योंकि, उनके विरोधियों के अनुसार, स्थिति बदली हुई है क्योंकि इस बार सिर्फ आरजेडी सुप्रीमो ही नहीं बल्कि उनका पूरा परिवार ही भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे है।

उजाड़ के कगार पर एशिया का सबसे बड़ा काॅपर उद्योग

खेतड़ी काॅपर काॅम्पलैक्स की बर्बादी के जिम्मेदार कौन?
डाॅ. भरत मिश्र प्राची - 2017-07-25 12:42 UTC
राजस्थान प्रदेश के शेखावटी क्षेत्र में सन्् 1971 से स्थित एशिया का सबसे बड़ा काॅपर उद्योग खेतड़ी काॅपर काॅम्पलैक्स सरकार की नई आर्थिक नीतियों , अनदेखी एवं अकुशल प्रबंध नीतियों के कारण आज उजाड़ के कगार पर खड़ा नजर आने लगा है। इस उद्योग में पूर्व में संचालित बड़े संयंत्र फर्टिलाइजर ,अम्ल, स्मेल्टर एवं रिफाइनरी एक -एक करके अब तक पूर्ण रुपेण बंद हो चुके है , जिसमें कार्यरत हजारों श्रमिक समय से पूर्व ही सेवा निवृृत हो चुके, जो बचे है, उन्हें इधर - उधर स्थानांतरित किया जा चुका है।

दवाओं की कीमतों को सही दायरे में लाना होगा

मुनाफे का निर्धारण लागत के हिसाब से करना होगा
डाॅक्टर अरुण मित्रा - 2017-07-24 12:09 UTC
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के दस्तावेज में सरकार ने स्वीकार किया है कि प्रत्येक साल 6 करोड़ 30 लाख लोग स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने के कारण गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। इस खर्च का 70 प्रतिशत दवाइयों और अन्य उपभोक्ता आइटमों पर होता है। सस्ती दवाइयों के उत्पादन पर बात तो होती है और जेनेरिक दवाओं के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल पर भी बल दिया जाता है। इसके अलावा दवाओं की कीमतों सरकार द्वारा तय करने पर भी विचार होता है और उचित कीमतों पर दवाइयों को बेचने के लिए दुकानें खोलने पर भी चर्चा होती है। लेकिन समस्या जस की तस बनी रहती है। सरकार का भी कहना है कि स्वास्थ्य पर उसके द्वारा किया जा रहा खर्च बहुत कम है। यही कारण है कि इस मसले पर गंभीर प्रयास किए जाने की जरूरत है।

एक और दलित राष्ट्रपतिः संशय और संभावनाएं

उपेन्द्र प्रसाद - 2017-07-22 11:46 UTC
डाॅक्टर रामनाथ कोविंद देश के नये राष्ट्रपति बन रहे हैं। उनके राष्ट्रपति बनने के साथ की तरह तरह की आशंकाएं और संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हैं, जिनके बारे मे कहा जाता है कि इसने संविधान के निर्माण के समय इसका विरोध किया था। इसके कारण एक ऐसा वर्ग है, जो डाॅक्टर कोविंद के राष्ट्रपति बनने से संविधान पर ही खतरा महसूस कर रहा है। वैसे लोग यह समझने में गलती कर रहे हैं कि आज का आरएसएस 1948 और 1949 का आरएसएस नहीं है। उसमें बदलाव आया है और उस बदलाव के कारण ही डाॅक्टर कोविंद राष्ट्रपति बन पाए हैं। वरना जब 1992 के चुनाव के पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने एक दलित के राष्ट्रपति बनाने की मांग की थी, तो उस समय के भाजपा नेताओं को अच्छा नहीं लगा था। वीपी सिंह की मांग को मानने वाले लोग बहुत कम थे, हालांकि उनकी मांग का ही दबाव था, जिसके कारण उस समय के आर नारायणन को कांग्रेस ने उपराष्ट्रपति बनवा दिया।

मध्यप्रदेश में किसानों की आत्महत्याएं

भारतीय जनता पार्टी कर रही है कुतर्क
एल एस हरदेनिया - 2017-07-21 12:17 UTC
भोपालः मध्यप्रदेश विधानसभा में विपक्ष ने किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के मसले पर काम रोको प्रस्ताव पेश किया। उसके जवाब में भाजपा के विधायकों ने जो तर्क दिए वह बहुत ही अटपटे थे।