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लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का प्रभाव सर्वोपरि

पर सत्ता परिवर्तनशील रही है
डाॅ. भरत मिश्र प्राची - 2017-10-17 11:14 UTC
राजतंत्र में शक्ति सदा से हावी रही तो लोकतंत्र में अभिव्यक्ति प्रभावी रही । सत्ता पाने के क्रम में छल प्रपंच की कला सदियों से चलती रही है। आज भी जारी है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का प्रभाव सर्वोपरि है। जिनके पास अभिव्यक्ति का माध्यम सशक्त है, जो तेज तर्रार , वाचाल है, जनता उसी के पास खींची चली आती है। राजनीति क्षेत्र से लेकर अध्यात्म तक अभिव्यक्ति के प्रभाव को आसानी से देखा जा सकता है। राजनीति में जिस नेता के पास बेहतर अभिव्यक्ति है, जनता उसी के सिर ताज रख देती है। अघ्यात्म में जिस गुरू के पास अभिव्यक्ति है, जनता उसे सारा कुछ सौंप देती है। इस तरह के अनेक उदाहरण वर्तमान परिवेष एवं इतिहास के आईने में देखे जा सकते है।

होशियारपुर के संदेशः भाजपा को रहना होगा अब होशियार

उपेन्द्र प्रसाद - 2017-10-16 10:21 UTC
पंजाब के होशियार लोकसभा क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। वह सीट भाजपा सांसद अभिनेता विनोद खन्ना के निधन से खाली हुई थी। श्री खन्ना वहां से लगातार चुनाव जीत रहे थे। भाजपा की चुनावी स्थिति अच्छी हो या खराब, लेकिन अपनी लोकप्रियता और जनता से जुड़ाव के कारण वे चुनाव जीत ही लेते थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उनकी जीत हुई थी, जबकि पंजाब में भाजपा का प्रदर्शन अन्य उत्तर भारतीय प्रदेशों के मुकाबले बहुत खराब था।

देश के राजनीतिक मिजाज में बदलाव के संकेत

दम तोड़ रहा है मोदी का जादू
अनिल जैन - 2017-10-14 15:50 UTC
देश के कई विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पिछले दिनों हुए छात्र संघ चुनाव के नतीजों को अगर देश के ताजा राजनीतिक मिजाज को मापने का पैमाना माना जाए तो संकेत साफ है कि देश के छात्र और युवा वर्ग में बेचैनी है और वह बदलाव के लिए आतुर है। यह संकेत केंद्र सहित देश के आधे से ज्यादा राज्यों में सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिए चेतावनी है और बता रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आकर्षण की चमक अब फीकी पडती जा रही है।

हिमाचल प्रदेश में भाजपा की जीत आसान नहीं होगी

उपेन्द्र प्रसाद - 2017-10-13 13:10 UTC
हिमाचल प्रदेश की विधानसभा के आमचुनाव की तारीखें तय कर दी गई हैं। आगामी 9 नवंबर को वहां मतदान होंगे और 18 दिसंबर को मतों की गणना होगी। मतदान की तारीख की घोषणा के 27 दिनों के अंदर ही मतदान कराकर निर्वाचन आयोग ने एक रिकाॅर्ड कायम कर दिया है। दूसरा रिकाॅर्ड गुजरात के चुनाव की तारीखों को साथ साथ घोषित नहीं करके बनाया गया है। दोनों राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल आगामी जनवरी महीने में समाप्त होते हैं। इसलिए कायदे से दोनों विधानसभाओं के लिए तारीखों की घोषणा एक साथ ही की जानी चाहिए थी, लेकिन निर्वाचन आयोग बेहद ही विचित्र तर्क दे रहा है कि गुजरात के चुनाव की तिथियां इसलिए घोषित नहीं की गई, क्योंकि आयोग नहीं चाहता कि वहां लंबे समय तक आदर्श चुनावी संहिता लागू रहे। गौरतलब हो कि चुनाव की तारीखें घोषित होते ही प्रदेश में आदर्श चुनावी संहिता अमल में आ जाती है और प्रदेश सरकार कोई लोकलुभावनी योजना या कार्यक्रम इस दौरान नहीं शुरू कर सकती।

राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए अच्छा समय

मोदी विरोधी भावना देश में पनप रही है
कल्याणी शंकर - 2017-10-12 13:47 UTC
अब राहुल गांधी 132 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनने के लिए अपने आपको तैयार कर रहे हैं। बहुत संभव है अगले महीने वे इस पद पर आसनी हो जाएं। इसे लेकर पार्टी के अंदर राहत की सांस ली जा रही है कि बहुत दिनों से चला आ रहा सस्पेंस अब समाप्त हो जाएगा।

केरल में हिंसक टकराव के बीच राजनीतिक जमीन की तलाश

यह हमारी अमानवीय चेहरे को सामने लाता है
अनिल जैन - 2017-10-11 13:24 UTC
भारतीय जनता पार्टी अपने ‘मिशन साउथ’ को पूरा करने के लिए मैदान में उतर चुकी है। दक्षिण भारत में वामपंथी दुर्ग कहा जाने वाला केरल उसका नया सियासी अखाडा है, जहां पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से लेकर हिंदुत्व का नया अखिल भारतीय पोस्टर ब्वॉय बनने को बेताब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और कई केंद्रीय मंत्री सडक पर उतर चुके हैं। राज्य में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच पिछले दशकों से जारी खूनी संघर्ष का शोर अब दिल्ली में भी सुनाई देने लगा है। भाजपा का मंसूबा इस संघर्ष में हो रही संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं की हत्याओं के मुद्दे को गरमा कर अगले विधानसभा चुनाव तक केरल की सत्ता पर काबिज होने या कम से कम मुख्य विरोधी दल के रूप में अपनी पहचान बनाने का है।

गुजरात विधानसभा चुनावः मोदी के लिए क्यों है यह बहुत महत्वपूर्ण

उपेन्द्र प्रसाद - 2017-10-10 14:06 UTC
गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों की घोषणा अभी तक नहीं हुई है, लेकिन वहां चुनावी संग्राम शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अबतक वहां की ताबड़तोड़ तीन यात्राएं कर डाली हैं और उनकी ये यात्रा सरकारी कम चुनावी ज्यादा होती हैं। गुजरात को उन्होंने बुलेट ट्रेन की सौगात दी है। ताजा यात्रा के पहले जीएसटी मे बदलाव कर वहां के व्यापारी वर्ग को राहत देने की कोशिश की। मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनावों की तरह ही लेते हैं। आखिर ऐसा वे करें क्यों नहीं, क्योकि अपनी पार्टी को वोट दिलाने वाले वे अब अकेले नेता रह गए हैं। पार्टी जीत के लिए उनपर पूरी तरह निर्भर हो गई है। जहां मोदी का सिक्का चलता है, वहां भाजपा की जीत हो जाती है। बिहार में मोदी का सिक्का नहीं चला था, इसलिए भाजपा वहां हार गई, हालांकि हारने के बावजूद वह वहां सत्ता में है।

उत्तर प्रदेशः अखिलेश की नई चुनौतियां

भाजपा के आक्रामक हिन्दुत्व की काट निकालना कठिन काम
प्रदीप कपूर - 2017-10-10 14:03 UTC
लखनऊः अखिलेश यादव अगले पांच सालों के लिए एक बार फिर समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष बन चुके हैं। अध्यक्ष बनने में तो उन्हें किसी प्रकार की चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन आने वाले समय में उन्हे पार्टी के अंदर और पार्टी के बाहर से कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

परमाणु संयंत्रों में काम करने वाले विकिरण से ग्रस्त

यूरेनियम खदानों में काम करने वालो का स्वास्थ्य भी खतरे में
डाॅ अरुण मित्र - 2017-10-07 11:36 UTC
परमाणु ऊर्जा को हमारे देश में ऊर्जा समस्या का रामबाण माना जा रहा है। यह सच है कि हमारे सामने ऊर्जा का गंभीर संकट है। हमें इसके लिए आयात पर निर्भर होना पड़ रहा है। हमारे विकास के लिए इसकी बहुत जरूरत है। लेकिन सवाल यह भी खड़े हो रहे हैं कि इस समस्या के समाधान का जवाब क्या वाकई परमाणु ऊर्जा है?

सुलभ जनसुविधाओं से आज भी वचिंत है सार्वजनिक स्थल

इस तरह के परिवेेश में भारत कैसे स्वच्छ रह पायेगा?
डाॅ. भरत मिश्र प्राची - 2017-10-07 11:26 UTC
केन्द्र की वर्तमान सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभालते ही महात्मा गांधी के जन्मदिन 2 अक्टूबर से भारत को स्वच्छ बनाने की दिशा में स्वच्छता अभियान का आगाज किया, जिसका परिणाम यह रहा कि आज देश का अधिकांश आम जन इस बात को समझने लगा तो है कि आस - पास का वातावरण साफ - सुथरा होना चाहिए, इसीलिये कुछ खाने के बाद व्यर्थ सामान को इधर - उधर फेंकने के वजाय वह कचरा पेटी तलाशता नजर आता है। आम दुकानदारों के साथ ठेले वाले भी अपने साथ कचरा रखने के पात्र साथ रखने लगे । रेलवे स्टेशन भी अब साफ - सुथरे नजर आने लगे । इस दिशा में पूर्व सरकारों एवं वर्तमान सरकार द्वारा भी जगह जगह सार्वजनिक स्थलों एवं बस स्टैंड के आस पास शौचालय एवं पेशाबघर बनाये गये जिसमें देश का करोडों का बजट भी लगा, पर सही रख - रखाव नहीं होने के कारण वे आज बेकार साबित हो रहे हैं।