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बिहार का बढ़ता राजनैतिक अनिश्चय

नीतीश कुमार के सामने नई चुनौती
उपेन्द्र प्रसाद - 2017-06-03 09:45 UTC
बिहार में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और नीतीश कुमार आज एक ऐसे दोराहे पर खड़े हैं, जिसकी दोनों राहें अनिश्चितता से भरी है। मंडल राजनीति से निकले सभी राजनेतओ मे नीतीश कुमार निश्चय ही सबसे ज्यादा राजनैतिक कुशलता रखने वाले नेता रहे हैं, जो जनाधारहीन होने के बावजूद न केवल लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री बने रहे हैं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी अपनी छाप छोड़ते रहे हैं। उनमें ऐसी कुशलता है कि भारतीय जनता पार्टी से दोस्ती करने, उसका समर्थन लेने और उसको समर्थन देने के बावजूद वे अपनी सेक्युलर छवि बनाने में सफल रहे हैं। बिहार में वे खुद अपने बूते मुख्यमंत्री नहीं बन सकते, बावजूद इसके वे प्रधानमंत्री के दावेदार बन जाते हैं।

मोदी की छाया में भारत के तीन साल

आर्थिक विषमता और बेरोजगारी बढ़ी
अनिल सिन्हा - 2017-06-02 12:54 UTC
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने तीन साल गुजार दिए हैं। यह समय इतना तेजी से बीता कि पता ही न चला। एक तेज गति से चलती फिल्म के नायक की तरह मोदी ने देश को चलाया है। हालांकि गहराई से देखने पर लगता है कि जिस गंभीरता की उम्मीद उनसे लोगों ने की थी, वह उसके पास तक भी न पंहुच पाए। ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारा था और लोगों ने तेज विकास के लिए उन्हें चुना था। जाहिर है उनके कार्यकाल का आधा से अधिक समय पूरा हो जाने के बाद लोग जानना चाहेगें कि उनके शासन की दिशा क्या रही और नतीजे में देश के हाथ क्या आया। सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम पाते हैं कि मोदी ने इन तीन सालों में ंविपक्ष को दबाए रखने में पूरी सफलता प्राप्त की है और 2019 के चुनावों में उन्हें चुनौती देने वाली कोई बड़ी ताकत सामने नहीं है।

मायावती लड़ रही हैं अब अस्तित्व की लड़ाई

भीम सेना के कारण भी नींद हराम
प्रदीप कपूर - 2017-06-01 11:32 UTC
लखनऊः पिछले विधानसभा चुनाव में हुई दुर्गति के बाद बसपा सुप्रीमो अस्तित्व संकट की लड़ाई लड़ रही है। इसके बाद अ बवह अपनी राजनीति को बदलने के लिए भी तैयार दिख रही हैं।

कश्मीर समस्या का राजनैतिक समाधान ढूंढ़ना चाहिए

हिंसक समाधान खोजने से स्थानीय लोग आतंकवादियों के खेमे में जा सकते हैं
कल्याणी शंकर - 2017-05-31 11:29 UTC
कश्मीर की समस्या दिनोंदिन बदतर होती जा रही है। हताश और गुमराह युवा सड़कों पर उतरकर सुरक्षा बलों पर पथराव कर रहे हैं। सुरक्षा बल भी उनके खिलाफ ताकत का इस्तेमाल कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आज हालत वहां 1990 से भी खराब है, जब वहां उग्रवाद अपने चरम पर था।

उत्तर प्रदेश में जंगलराज

बर्दी की रौब बहाल की जानी चाहिए
उपेन्द्र प्रसाद - 2017-05-30 12:43 UTC
उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति कभी बेहतर नहीं रही, लेकिन इस समय जो स्थिति है, वह पहले कभी नहीं रही होगी। चारों तरफ अराजकता का माहौल है। सभी तरह के अपराध बढ़ रहे हैं। 15 मार्च और 15 मई के बीच पिछले साल और इस साल के गंभीर अपराधों के मामलों की तुलना की जाय, तो उन अपराधों में 4 गुना से भी ज्यादा का इजाफा हुआ है। हत्या, बलात्कार, लूट, डकैती और अपहरण के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। जातीय तनाव ने भी विस्फोटक रुख अख्तियार कर लिया है।

गृहयुध्द की शक्ल लेता सामाजिक टकराव

प्रधानमंत्री की चुप्पी को देश के लिए शुभ नहीं
अनिल जैन - 2017-05-29 13:05 UTC
तीन साल पहले प्रधानमंत्री बनने के ढाई महीने बाद जब नरेंद्र मोदी ने स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से पहली बार देश को संबोधित किया था तो उनके भाषण को समूचे देश ने ही नहीं बल्कि दुनिया के दूसरे देशों ने भी बडे गौर से सुना था। विकास और हिंदुत्व की मिश्रित लहर पर सवार होकर सत्ता में आए नरेंद्र मोदी ने अपने उस भाषण में देश की आर्थिक और सामाजिक तस्वीर बदलने वाले कुछ कार्यक्रम पेश करते हुए देश से और खासकर अपनी पार्टी तथा उसके सहमना संगठनों के कार्यकर्ताओं से अपील की थी कि अगले दस साल तक देश में सांप्रदायिक या जातीय तनाव के हालात पैदा न होने दें। प्रधानमंत्री ने कहा था- ‘जातिवाद, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद, सामाजिक या आर्थिक आधार पर लोगों में विभेद, यह सब ऐसे जहर हैं जो हमारे आगे बढने में बाधा डालते हैं। आइए, हम सब अपने मन में एक संकल्प लें कि दस साल तक हम इस तरह की किसी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे। हम आपस में लडने के बजाय गरीबी से, बेरोजगारी से, अशिक्षा से तथा तमाम सामाजिक बुराइयों से लडेंगे और एक ऐसा समाज बनाएंगे जो हर तरह के तनाव से मुक्त होगा। मैं अपील करता हूँ कि यह प्रयोग एक बार अवश्य किया जाए।’

मध्यप्रदेश में नर्मदा के किनारे खनन पर पूर्ण पाबंदी

रेत की कीमतों में भारी उछाल
एल एस हरदेनिया - 2017-05-29 13:02 UTC
भोपालः इस अहसास के बाद कि नर्मदा के किनारे हो रहे रेत खनन से वहां के पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है, सरकार ने नदी के किनारे उसके खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। उस खनन के खतरे का पता पहले से ही था, लेकिन 148 दिनों की नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री चैहान ने उस खतरे का खुद जायजा लिया और फिर उस पर रोक लगाने का आदेश जारी कर दिया।

दिल्ली की हार के बाद कपिल का प्रहार

केजरीवाल की लोकप्रियता में भारी गिरावट
उपेन्द्र प्रसाद - 2017-05-27 11:29 UTC
नई दिल्लीः दिल्ली नगर निगम के चुनावी नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है। हार के बाद मंत्री पद से हटाए गए विधायक कपिल मिश्र ने एक के बाद एक जो आरोप उनपर लगाए हैं, उनसे उनकी लोकप्रियता को और चोट पहुंच रही है।

सहारनपुर का जाति युद्ध

योगी सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती
उपेन्द्र प्रसाद - 2017-05-25 10:52 UTC
उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद आदित्यनाथ योगी ने एक से एक लोकप्रियतावादी घोषणाएं और निर्णय कर डालीं और ऐसा लगने लगा कि देश को और खासकर भारतीय जनता पार्टी को एक ऐसा नेता मिल गया है, जो नरेन्द्र मोदी की जगह लेने में सक्षम है। कोई उन्हें मोदी का वारिस कहने लगा तो कोई उन्हें 2019 के चुनाव के बाद ही मोदी की जगह देश का प्रधानमंत्री बनाने लगा। लेकिन समय बीतने के साथ यह स्पष्ट हो गया है कि योगी जी उत्तर प्रदेश को संभालने लायक नेता भी नहीं हैं और शायद नरेन्द्र मोदी ने देश की सबसे बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश के लिए मुख्यमंत्री का चयन करते वक्त भारी गलती कर दी और एक अयोग्य व्यक्ति को उस पद पर बैठा डाला।

जनहित व राष्ट्रहित में अपराध मुक्त लोकतंत्र का होना जरूरी

भरत मिश्र प्राची - 2017-05-24 12:48 UTC
स्वतंत्रता उपरान्त स्थापित लोकतंत्र में धीरे - धीरे अपराध जगत ने अपनी जगह बना ली जिससे लोकतंत्र का स्वरूप ही बदल गया । इस बदले स्वरुप ने लोकतंत्र की काया को ही विकृृत कर डाला, जिसके कारण आज संसद एवं विधान सभा की मर्यादाएं भंग होती नजर आने लगी है। जनप्रतिनिधियों द्वारा विरोध प्रदर्शन के तौर तरीके हुड़दंगबाजी के स्वरुप में बदल गये है। संसद एवं विधानसभा में गाली गलौज से लेकर जुते चप्पल चलाना, सामने लगे माईक से प्रहार करना आम बात हो गई है। सभा अध्यक्ष की गरिमा का तो कोई ख्याल ही नहीं। उसके बार - बार मना करने के बावजूद भी चीखना, चिल्लाना, अभद्र व्यवहार करना विरोध प्रकट करने के तेवर में समा चुका है। लोकतंत्र में बाहुबलियों के प्रभाव के कारण इस तरह के हालात उभर चले है। आज देश का कोई भी राजनैतिक दल इस तरह के परिवेश से परे नहीं है।