नग्न अवसरवाद और मूल्यहीनता का खुला खेल अभी भी चलता है
अनिल जैन
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2016-05-16 17:16 UTC
भारतीय राजनीति में आचरण की शुचिता और वैचारिक प्रतिबध्दता का लोप हुए बहुत लंबा अरसा बीत चुका है, लिहाजा व्यक्तिगत या सामूहिक दल-बदल की खबरें अब किसी को भी चैकाती या हैरान नहीं करती हैं। हां, इस बात पर कोफ्त जरुर होती है कि सात दशक पूरे करने जा रहे हमारे लोकतंत्र के अनुभव ने देश की राजनीति को पतन के किस दलदल में लाकर खडा कर दिया है। छोटे राज्यों की विधानसभाओं में तो, जहां दो राजनीतिक दलों के बीच बहुमत के लिए बहुत कम सदस्यों का अंतर होता है, अक्सर ही विधायकों को पाला बदल कर राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति पैदा करते देखा जाता है। हाल के दिनों में उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश विधायकों के दल-बदल के चलते राजनीतिक अस्थिरता के शिकार हो चुके हैं। झारखंड, छत्तीसगढ, गोवा में भी ऐसे हालात पैदा होते रहे हैं और सीमावर्ती पूर्वोत्तर के तमाम छोटे-छोटे सूबे तो अक्सर ऐसी स्थिति से दो-चार होते ही रहते हैं।