भारत
राजनीति खतरे में पड़ने से बेचैन हो रहे नेता
काठ की हांड़ी कितनी बार आग पर चढ़ेगी?
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2014-10-14 16:30 UTC
जनता दल से टूट टूट कर बनी पार्टियों के कुछ नेता एक बार फिर एक साथ आने के लिए बेचैनी से हाथ पांव मार रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों के नतीजे के बाद नवीन पटनायक को छोड़कर इस परिवार के सभी नेताओं की राजनीति खतरे में दिखाई पड़ने लगी। नीतीश कुमार को तो मुख्यमंत्री की अपनी कुर्सी तक गंवानी पड़ी। अजित सिंह अपने पूरे कुनबे के साथ चुनाव हार गए और खुद तीसरे स्थान पर आ गए। बेचारे को दिल्ली का बंगला छोड़ना पड़ा, हालांकि उसे बरकरार रखने के लिए उन्होंने आंदोलन तक छेड़ डाला। मुलायम सिंह यादव की पार्टी तो हारी, पर उनके कुनबे की जीत हुई। इसलिए वे अपने भविष्य के लिए पूरी तरह से चिंतित नहीं दिखे और उपचुनावों में जीत दर्ज करने के बाद वे कथित जनता दल परिवार के अन्य नेताओं की तरह बदहवाश नहीं, लेकिन मुलायम और नवीन पटनायक के अलावा अन्य सारे जनता नेता अपना अपना राजनैतिक बजूद बचाए रखने के लिए जबर्दस्त हाथ पैर मारने में लगे हुए हैं।