अमल
अमल या अमलि का अर्थ निर्मल होता है। इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग बहुधा मिलता है। परन्तु योगियों और संतों में एक वर्ग, जिनमें कबीर भी शामिल हैं, ने इस शब्द का प्रयोग उस दिव्य मद्य के रूप में किया है जिसे पीकर योगी मस्त रहते हैं। इस अमलि का पान कर संत हमेशा मत्त अवस्था में रहते हैं, ऐसी मान्यता है।जो ऐसी अमलि पी ले वह अन्य किसी सांसारिक मद्य या नशे को तुच्छ समझता है।
इस दिव्य मद्य को कबीर ने तो राम रस कहा है। इतना ही नहीं, उन्होंने कहा कि यदि को इस दिव्य मद्य का एक बूंद भी दे दे तो मैं उसके बदले उसे अपना सब जप-तप दलाली के रूप में दे दूंगा।