अवधूती
अवधूती सुषुम्ना नाड़ी को कहते हैं। इसे शून्यपदवी, राजपथ, ब्रह्मरन्ध्र, महापथ, श्मशान, शाम्भवी, मध्यमार्ग, ब्रह्मनाड़ी, सरस्वती आदि के नाम से भी जाना जाता है। जैसा कि हम जानते हैं इड़ा तथा पिंगला को गंगा-यमुना भी कहा जाता है और इस प्रकार योगियों के लिए गंगा-यमुना-सरस्वती इसी शरीर के अन्दर प्रवाहित होती है।बौद्धगान में इसे इस प्रकार बताया गया -
अवहेलया अनाभोगेन क्लेशादि पापान् धुनोति इत्यवधूती।
अर्थात् जो अनायास ही सभी क्लेशादि पापों को दूर कर देती है वह अवधूती है।
हिन्दू तंत्र साधकों, वज्रयानियों, सिद्धों तथा हठयोगियों में इस अवधूती का विशेष महत्व है।
यह नाड़ी बांयीं ओर की इड़ा तथा दायीं ओर की पिंगला नाड़ियों के बीच स्थित है। इसे विशुद्ध रूप माना गया जबकि इड़ा तथा पिंगला को अविशुद्ध रूप माना गया। जब ये विशुद्ध होकर एक हो जाती हैं तो वह अवस्था अवधूती अवस्था कही जाती है।
साधनमाला में इसे जहां एक ओर महासुखाधार रूपिणी कहा गया वहीं हेमवज्रतंत्र में इसे ग्राह्य-ग्राहकवर्जिता कहा गया।
यही नाड़ी वज्रयानियों के लिए निर्वाण का अवधूती मार्ग है। यही शून्यपथ आनन्दावस्था प्रदात्री है।
हठयोग में इसी नाड़ी को शाम्भवी शक्ति कहा गया है।
जब कुंडलिनी (शक्ति) जागृत होती है तो वह उद्भूत होकर इसी मार्ग से सहस्रार स्थित शिव तक पहुंचती है। यही कारण है कि अवधूती को योगी अन्य नाड़ियों की तुलना में सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं।