अविचल आलोचना प्रणाली
अविचल आलोचना प्रणाली साहित्य की एक आलोचना प्रणाली है। इसके मानने वाले आलोचक कहते हैं कि साहित्य के मूल तत्व जीवन के मूल तत्व की भांति एक ही है। यह चिरन्तन एवं शाश्वत है। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। यह अविचल है। साहित्य के रूप चाहे जितने ही बदल जायें मूल तत्व वही रहता है। अतः आलोचना का मानदंड इनके अविचल मूल तत्व होने चाहिए।इस प्रकार, इन आलोचकों के अनुसार चूंकि साहित्य का मूल रूप अविचल है इसलिए आलोचना के मानदंड भी अविचल हैं।
इस आलोचना प्रणाली में नीति, मर्यादा, आदर्श आदि को ही मुख्यतः आधार मानकर साहित्य की आलोचना की जाती है। सत्य, शाश्वत और चिरन्तन धर्म भी इस आलोचना का आधार हो सकता है।
जो साहित्य इन आधारों पर खरा नहीं उतरता उसे निकृष्ट घोषित कर दिया जाता है। जो कला और साहित्य मनुष्य को मानसिक धरातल पर विकसित नहीं बल्कि विकृत करते हैं उनकी निंदा इस आलोचना प्रणाली के चिंतक करते हैं।