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अश्लीलता

किसी भी समाज या व्यक्ति की भाषा, उसके साहित्य, उसकी कला, उसके द्वारा किये जाने वाले संकेतों को तब अश्लीलता कहा जाता है जब उन्हें सभ्यता या विधि-विधान के तहत अश्लील माना जाता है, तथा जो सभ्य समाज में अभिव्यक्त करना विधि या परम्परा से वर्जित है।

अश्लीलता क्या है इसकी परिभाषा अनेक रुपों से दी गयी है। श्रीविहीन, गुणविहीन और कुत्सित होना इसकी अनिवार्य शर्त है। अश्लीलता शब्दगत और भावगत दोनों हो सकती है।

साहित्य में इसे अर्थ-दोष, शब्द-दोष तथा पद-दोष माना गया है।

वामन ने काव्यालंकारसूत्र में कहा कहा कि असभ्य या अशोभन अर्थ की संभावना रखने वाला और असभ्य वस्तु की स्मृति जगाने वाला काव्य अश्लील होता है।

अश्लीलता के निर्धारण में ध्यान रखने की बात यह है संदर्भ। सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में ही इसका निर्धारण किया जाना चाहिए और ये संदर्भ ही इसकी परिधि है। इस परिधि के बाहर के विषय, जैसे चिकित्सा शास्त्र, में यह मानदंड लागू नहीं होता।

अश्लीलता तीन प्रकार की होती है - व्रीडाव्यंजक, जुगुप्साव्यंजक तथा अमंगलव्यंजक।

व्यक्ति तथा समाज के हितों को ध्यान में रखकर अश्लीलता को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। परन्तु बहुत से साहित्यकार, कलाकार, तथा अन्य लोगों को लगता है कि इससे उनके विचारों की स्वतंत्रता का हनन होता है। ऐसे लोग अपना अधिकार तो देखते हैं लेकिन उन्हें अन्य व्यक्ति और समाज के हित-अहित की परवाह नहीं होती तथा वह दूसरों के प्रति अपना कर्तव्य ध्यान में नहीं रखते। उनसे यह प्रश्न किया जाता है कि क्या वे जबतक अश्लीलता की अभिव्यक्ति न कर लें तब तक वह अपने को अबाधित क्यों नहीं महसूस करते। अश्लीलता की अभिव्यक्ति ही उनके लिए अनिवार्य क्यों है? क्या उनमें इतनी सामर्थ्य नहीं कि बिना अश्लीतता का सहारा लिए अपनी बात कह सकें?

अश्लीलता को रोकने संबंधी कानून तथा सेंसरशिप आदि होने पर भी अश्लीलता का प्रदर्शन तथा उसकी अभिव्यक्ति विभिन्न समाजों में लगातार होती रही है। इनका पक्षपोषण समाज के लोग ही करते हैं।

अश्लीलता को रोकने का विचार रखने वालों का तर्क है कि अश्लीलता को किसी भी तरह से बढ़ावा देने से कुत्सित प्रवृत्तियों का सृजन और उनको बढ़ावा मिलता है। इससे व्यक्ति, परिवार तथा समाज सबका अहित होता है।

अश्लीलता अत्यन्त उग्र रूप में पोर्नोग्राफी आदि के रूप फिल्म, कला, साहित्य, और इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर परोसा जा रहा है।

'व्यक्ति, परिवार तथा समाज का हित' तथा 'अल्प संख्या वाले मुट्ठी भर कलाकारों, साहित्यकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा' में से यदि किसी एक का चयन करना हो तो समाज के हित को ही चुनना अधिक लाभदायक होगा, ऐसा अधिकांश लोगों का मानना है। कुछ लोगों को छूट देकर समाज का नाश उपयुक्त नहीं।

कुल मिलाकर अश्लीलता का प्रश्न विवादास्पद बना हुआ है।

Page last modified on Wednesday January 29, 2014 18:02:25 GMT-0000