अष्टयाम
अष्टयाम का अर्थ है आठ पहर। एक दिन-रात में आठ याम होते हैं इसलिए इसे अष्टयाम से अभिहित किया जाता है। साहित्य में एक दिन से सूर्योदय से दूसरे दिन के सूर्योदय तक किसी देवाता, मनुष्य आदि की जीवनचर्या के वर्णन को भी अष्टयाम कहा जाता है। अष्टयाम एक धार्मिक अनुष्ठान भी है जिसमें दिन के किसी समय से प्रारम्भ कर दूसरे दिन उसी समय तक भजन-कीर्तन आदि किया जाता है।हिन्दी साहित्य में यह एक काव्यरूपक है। कविता के माध्यम से ही किसी देवाता, देवी, नायक, नायिका, व्यक्ति आदि की दिन-रात की चर्या का बखान किया जाता है। परन्तु ध्यान रखने की बात यह है कि यह कथा प्रबंध नहीं है।
कुछ साहित्यकार इसीलिए इसे मुक्तक निबंध भी कहते हैं। हिंदी के विख्यात समालोचक ने ऐसी रचनाओं को वर्णनात्मक प्रबंध कहा।
साहित्य की विधा के रुप में अष्टयाम का विकास रीतिकाल में विशेष रुप से हुआ परन्तु इसके बीज संस्कृत साहित्य में कालिदास के ऋतुसंहार में मिलता है जिसमें ऋतुओं के अनुरूप विलासी व्यक्तियों की जीवनचर्या का वर्णन है।