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असमिया भाषा

असमिया भारत के असम राज्य में बोली जाने वाली एक भाषा है। तेरहवीं शताब्दी में असम शब्द का प्रचलन कामरूप राज्य के लिए होना प्रारम्भ हुआ। एक विशाल भूभाग को तभी से असम कहा जाने लगा और वहां की भाषा का नाम भी असमिया पड़ गया।

परन्तु सातवीं शताब्दी से इस भाषा के अस्तित्व में होने के संकेत मिलते हैं। चीनी परिव्राजक ह्वेन त्सांग इसी शताब्दी में भारत भ्रमण के क्रम में कामरूप पहुंचे थे। उन्हें उस समय वहां के राजा भास्कर वर्मन ने आमंत्रित किया था। अपने यात्रा वृतांत में ह्वेन त्सांग लिखते हैं कि कामरूप की भाषा मध्य भारत की भाषा से भिन्न थी।

इससे निष्कर्ष निकाला जाता है कि सातवीं शताब्दी में अर्धमागधी अपभ्रंश से एक भिन्न भाषा बनने लग गयी थी। प्रचीन असमिया के शब्द छठी से दसवीं शताब्दी तक के बौद्धों तथा सिद्धों द्वारा रचित पदों तथा ग्रंथों में मिलते हैं। तिब्बत से प्राप्त 'बाह्यान्तर बोधि चितबन्धो प्रदेश' नामक ग्रंथ की चर्चा करते हुए राहुल सांकृत्यायन ने भी प्राचीन असमिया शब्दों के उसमें होने का उल्लेख किया है।

असमिया भाषा की लिपि एक प्रकार से देवनागरी लिपि का ही अन्यतम स्वरूप है। कुमार भास्कर वर्मन का एक ताम्र-फलक मिला है जिसमें इस लिपि के प्रयोग का प्राचीनतम उदाहरण है। इस फलक के सन् 610 के होने का अनुमान लगाया गया है।

आधुनिक लिपि में थोड़ी भिन्नता है। इसकी साम्यता मैथिली लिपि से अधिक है। बहुत लोग असमिया लिपि को बंगला लिपि मानते हैं जो गलत है। इसका 'र' तथा 'व' में बंगला लिपि से भेद है तथा इसका अंतिम वर्ण भी बंगला में नहीं है। फिर भी औद्योगिक आधुनिक सभ्यता ने दोनों भाषाओं को काफी निकट कर दिया है जिसके कारण आधुनिक असमिया तथा आधुनिक बंगला में काफी साम्यता आ गयी है।

असमिया वर्णमाला का उच्चारण भी भिन्न है जिसकी सभी ध्वनियां कोमल हैं। कठोर उच्चारण तो द्वित्ववर्ण का भी नहीं है। मूर्धन्य तथा दन्त अक्षरों की लिपि में भेद होने पर भी उच्चारण समान ही है।

रूप में भिन्नता, गुणों को दर्शाने के लिए शब्द द्वित्व करने की प्रवृत्ति, शब्द के दूसरे अक्षर पर बल देना इस भाषा की विशेषता है।

इस भाषा में सम्बंधवाचक शब्दों में व्यक्तिवाचक प्रत्यय लगाकर कौटुम्बिक सम्बंध दिखाने की प्रवृत्ति होती है तथा पुरुष भेद होने पर प्रत्यय का भी भेद कर दिया जाता है। आयु के अनुसार सम्बंधवाचक शब्द भी होते हैं। समूहवाचक शब्दों के लिए प्रत्यय लगाये जाते हैं। जब नकारात्मक अर्थ में क्रिया का प्रयोग होता है तो 'न' प्रत्यय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जो क्रिया के पहले अभिन्न रूप से लगाया जाता है।

असमिया भाषा भी विश्लेषणात्मक भाषा है, अर्थात् पहले कर्ता, कर्म और फिर क्रिया का अन्त में प्रयोग होता है।

व्याकरण में यह संस्कृत की ही अनुगामिनी मालूम पड़ती है परन्तु संधि, समास आदि में स्थानीय अन्तर भी देखा जाता है। संज्ञा तथा क्रिया में यह संस्कृत का ही अनुकरण करती है। केवल वाक्य विन्यास में यह संस्कृत से भिन्न है जो कि संयोजनात्मक (सिंथेटिक) भाषा है।

तेरहवीं शताब्दी तक असमिया भाषा काफी विकसित हो चुकी थी तथा उसी समय से असमिया साहित्य की रचना भी होने लगी थी।

Page last modified on Thursday February 6, 2014 11:38:40 GMT-0000