अहंकार
मूलतः अहंकार अहं के बोध को कहा जाता है। इस अर्थ में यह समाज के लिए अहंकार मान्य है लेकिन दूसरे अर्थ में अहंकार समाज को मान्य नहीं है क्योंकि मैं ही शक्तिशाली, सामर्थ्यवान, धनी, सुखी आदि हूं ऐसा मानकर व्यक्ति घमंडी हो जाता है तथा दूसरे को हेय समझता है।अहंकार अन्तःकरण का वह स्वरुप है जिसमें 'मैं हूं' का भाव सदा ही बना रहता है। इसका आधार बुद्धि ही है जिसमें पहले से ही 'हूं' का भाव विद्यमान रहता है। यह आत्मानुभूति की सीमित दशा है। इसमें तमोगुण की प्रधानता होती है परन्तु सत्व और रज के गुण भी व्याप्त रहते हैं।
अहंकार हमेशा 'मैं' के प्रति सचेत रहता है।
सिद्ध सिद्धान्त के अनुसार अहंकार के धर्म हैं - मान, ममता, सुख, दुःख तथा मोह।
बौद्ध दर्शन की वज्रयान शाखा में वज्रयानी साधक स्वयं को देवता समझ लेता है तो इसे वज्रयानी साधना पद्धति में अहंकार कहते हैं।
अहंकार पद्धति में मंत्र जप करते करते साधक की एक अवस्था ऐसी आती है जब उसमें अति आवेश जाग्रत होता है। फिर वह काम, क्रोध आदि का उपशमन कर ऊंची अवस्था में पहुंचता है।