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आकाश

जब हम ऊपर की ओर देखते हैं तो जो स्थान दिखायी देता है, जिसमें चांद, तारे, सूर्य, बादल, बिजली आदि सभी दिखते हैं उसे आकाश के नाम से जाना जाता है।

यह रिक्त स्थान जैसा प्रतीत होता है परन्तु विद्वानों का मत है कि एक सूक्ष्म महत् तत्व है जो सर्वत्र है। पाश्चात्य वैज्ञानिक भी ईथर नाम के एक पदार्थ का उल्लेख करते हैं जो सर्वत्र विद्यमान है। यह महत् तत्व दृष्टिगोचर नहीं होता। जो दृष्टिगोचर होता है वह विभिन्न बड़े आकार के पिंड हैं।

परन्तु भारतीय योगियों, विशेषकर हठ योगियों के लिए आकाश कुछ और है। गोरखनाथ कहते हैं कि देह के छह चक्रों, सोलह आधारों, दो लक्ष्यों, से साथ जो योगी पांच आकाशों की जानकारी नहीं रखता वह सिद्धि पा ही नहीं सकता।

इस प्रकार योग में पांच प्रकार के आकाश हैं। इन्हें आकाश, प्रकाश, महाकाश, तत्वाकाश तथा सूर्याकाश का नाम दिया गया है।

आकाश श्वेतवर्ण ज्योति स्वरूप है।

प्रकाश उस आकाश के भीतर रक्तवर्ण ज्योति स्वरूप है।

महाकाश उस प्रकाश के भीतर धूम्रवर्श ज्योति स्वरूप है।

तत्वाकाश उस महाकाश के भीतर नीलवर्ण ज्योति स्वरूप है।

महाकाश उस तत्वाकाश के भीतर विद्युतवर्ण ज्योति स्वरूप है।


Page last modified on Monday February 17, 2014 06:43:10 GMT-0000