आत्मचेतना
आत्मचेतना चेतना का वह स्वरूप है जिसमें व्यक्ति को अनुभूति होती है कि उसे किसी अनुभूति विशेष की अनुभूति हो रही है।उदाहरण के लिए किसी पक्षी को देखना एक अनुभव है। जब व्यक्ति के यह ज्ञान होता है कि उसे पक्षी को देखने का अनुभव हो रहा है तो यह उसकी आत्मचेतना हो जाती है।
आत्मचेतना से अलग वस्तु या विषय की भी चेतना मात्र रह सकती है। मनोविज्ञान में वस्तुचेतना आत्मचेतना से पहले ही विकसित होना कहा गया है।
इसका अर्थ यह हुआ कि आत्मचेतना के लिए अनुभूति का होना पर्याप्त नहीं बल्कि अनुभूति के होने का ज्ञान या उसकी अनुभूति होना आवश्यक है। इसलिए संभव है कि शिशु के अनुभवों में आत्मचेतना न हो, जैसा कि आधुनिक मनोवैज्ञानिकों का मानना है।
दर्शन में आत्मचेतना की अहम् भूमिका है।
प्रत्यक्षवादी तथा विज्ञानवादी, दोनों प्रकार के दार्शनिक आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए आत्मचेतना का ही सहारा लेते हैं।
'मैं हूं' ऐसा कहना अपने आप में होने का ज्ञान या उसकी अनुभूति है। प्राचीन भारतीय दार्शनिकों का शुद्ध 'अहम्' हो या पश्चिम के आधुनिक दार्शनिक रेनी डेकार्ट, अनेक विद्वानों ने इस आत्मचेतना का प्रयोग का अपनी बातें कहने की कोशिशें की हैं।