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आत्मपीड़न

आत्मपीड़न एक मनोदशा है जिसमें व्यक्ति स्वयं को शारीरिक या मानसिक रूप से पीड़ित कर तृप्ति पाता है। यह मानव स्वभाव की एक विकृति है। यह परपीड़न के विपरीत मनोदशा है। इसकी प्रबलता अत्यन्त ही विनाशकारी है।

सामान्यतः यौन वृत्ति में व्यक्ति में आत्मपीड़न तथा परपीड़न दोनों ही पाया जाता है। एक समय आता है जब यौन वृत्ति गौण हो जाती है तथा आत्मपीड़न ही मुख्य लक्ष्य बन जाता है।

पश्चिमी मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने आत्मपीड़न के तीन प्रकार बताये हैं - कामवृत्तिविषयक आत्मपीड़न, स्त्रैण आत्मपीड़न तथा नैतिक आत्मपीड़न।

कामवृत्ति विषयक आत्मपीड़न की मनोदशा सामान्यतः स्नायविक विकृत्तियों वाले व्यक्तियों में उत्पन्न होती है। उनके अनुसार ऐसे व्यक्ति स्वयं को अधिक से अधिक पीड़ा पहुंचाकर, अपने प्रति ही कठोर व्यवहार कर या फिर स्वयं को ही अपनानित करते हैं। ऐसा करने से ही उन्हें यौन तृप्ति मिलती है। यह कोई आवश्यक नहीं कि यौन वृत्ति के समय ही वे ऐसा करते हैं। अनेक बार यह अन्य समयों में भी प्रकट होता है। कई बार यह अप्रकट रूप से भी विद्यमान रहता है।

इस मानसिक विकृति का सही-सही कारण का पता लगाना मुश्किल होता है। परन्तु इतना अनुमान किया जाता है कि यौन अतृप्ति या तृप्ति में अवरोध के प्रतिकार स्वरूप परपीड़न की विकृति उत्पन्न हो जाती है, और परपीड़न न कर पाने की स्थिति में वह आत्मपीड़न कर तृप्ति पाने लगता है। ध्यन रहे कि आत्मपीड़न तथा परपीड़न एक ही सिक्के के दो पहलू हैं तथा प्रायः एक दूसरे के साथ प्रकट-अप्रकट रूप में सदैव रहते हैं।

जीवशास्त्रीय दृष्टिकोण से आत्मपीड़न की विकृति अचेतन दमन, वर्जना, तथा स्वभाव की प्रवृत्तियों में वियोजन के कारण उत्पन्न हो सकती है।

स्त्रैण आत्मपीड़न स्त्रियों में पाया जाता है। यह स्त्री स्वभाव में एक विशेष विकृति है। सामान्यतः स्त्री की स्वाभाविक आक्रामक प्रवृत्ति पर नैतिक तथा सामाजिक दबाव के कारण उसकी पीड़ा पहुंचाने की प्रवृत्ति आत्ममुखी हो जाती है तथा स्वयं को पीड़ित कर यौन तृप्ति प्राप्त करने लगती है। इस तरह मानसिक विकृति का शिकार होने पर स्वयं को पीड़ित करने से उसे संतोष मिलता है। पीड़ा में वह आनन्द लेने लगती है तथा उसकी यौन तृप्ति भी तभी होती है। स्नायविक रूप से रोगग्रस्त महिलाओं में यह प्रबल हो जाती है। वास्तविक पीड़ा न मिलने पर पीड़ा की कल्पना कर भी ऐसे मनोरोगी संतुष्ट हो जाते हैं।

नैतिक आत्मपीड़न का मूल कारण अपराधबोध माना जाता है। यह रोग प्रबल होने पर अकारण ही व्यक्ति स्वयं को दोषी या अपराधी मानकर आत्मग्लानि अनुभव करता है तथा स्वयं को निरंतर पीड़ित करता रहता है। फ्रायड के अनुसार, इससे रोगी की अचेनतन काम-वासनाएं अप्रत्यक्ष रूप से तृप्त होती हैं।

मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार आत्मपीड़न के शिकार रोगियों की चिकित्सा संभव है।


Page last modified on Wednesday April 16, 2014 11:11:04 GMT-0000