आत्मवाद
आत्मवाद भारतीय चिंतन परम्परा का एक दर्शन है।सनातन धर्म या हिन्दू धर्म इसी आत्मवाद के दर्शन को रेखांकित करता है।
इसके अनुसार जीवधारियों में एक आत्मा होती है। आत्मा आनादि और अनन्त है। इसका न जन्म होता है और न इसका निधन। आत्मा नित्य है, शाश्वत है। आत्मा अपरिवर्तनशील है तथा जीवधारी में साक्षी की तरह स्थापित है। यह चेतन है।
आत्मवाद में आत्मा का अर्थ है वह जो निरन्तर विद्यमान और व्याप्त है।
शंकराचार्य ने इसे इस प्रकार परिभाषित किया है - क्योंकि यह सबको व्याप्त करती है, ग्रहण करती है, इस लोक में विषयों को भोगती है और इसका सदैव सद्भाव रहता है इसलिए इसे आत्मा कहा जाता है। परन्तु अपने कठोपनिषद् भाष्य में उन्होंने यह कहा कि आत्मा शब्द इस लोक में प्रत्यक् (सम्पूर्ण विषयों को जानने वाला) के अर्थ में रूढ़ हो गया है किसी अन्य अर्थ में नहीं।
उपनिषदों में आत्मा शब्द का अर्थ एक 'तत्व' के अर्थ में किया गया जिसकी सत्ता सतत् बनी रहती है। ऐतरेयोपनिषद् में आत्मा को ही जीव के अस्तित्व का आदि कारण सिद्ध किया गया तथा परमात्मा को मूल तत्व या जगत् का आदि कारण बताया गया। फिर कहा गया कि आत्मा या परमात्मा दो नहीं हो सकते, वे ते एक ही हैं। दो मानने को द्वैतवाद कहा गया तथा एक मानने को अद्वैतवाद कहा गया।
आत्मा को चैतन्य स्वरूप कहा गया, चेतना तो मात्र एक गुण भर है। इस प्रकार चेतना तथा चैतन्य में भी भेद किया गया।
श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया कि शरीर क्षेत्र है तथा आत्मा क्षेत्रज्ञ।