आम्नाय
भारतीय तन्त्र शास्त्रों में आम्नाय भगवान सदाशिव के छह उपदेशों को कहा जाता है।भगवान शिव ने ये उपदेश अपने एक-एक मुख से एक-एक कर दिये थे। शिव के पांच मुखों से इस प्रकार पांच आम्नाय निकले तथा छठे गुप्त मुख, जो नीचे की ओर अभिमुख मुख है, से एक आम्नाय का उपदेश उन्होंने दिया। प्रथम चार आम्नाय धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की प्रप्ति के लिए है जबकि दो अन्य उर्ध्वामनाय, तथा आद्याम्नाय केवल मोक्ष के लिए है।
अपने पूर्वमुख सद्योजात से उन्होंने जो उपदेश दिया था उसे पूर्वाम्नाय कहते हैं। इसमें भुवनेश्वरी, त्रिपुरा, ललिता, पद्मा, और शूलिनी आदि देवियों की अर्चना की विधि और उसके लिए मंत्र हैं। निरुत्तर तंत्र में इसे पशु साधकों के लिए बताया गया है।
दक्षिणमुख से निकला उपदेश इस प्रकार दक्षिणाम्नाय के नाम से जाना गया। दक्षिणमुख को अघोर नामक तीन आंखों वाल पीताभ मुख से भी जाना जाता है। इमें महाप्रसादमंत्र, दक्षिणामूर्ति, वटुक, मंजुघोष भैरव, मृतसंजीवनी विद्या तथा मृत्युंजय मंत्र और अर्चना की विधियां हैं। निरुत्तर तंत्र में इसे पशु साधकों के लिए बताया गया है।
पश्चिममुख से दिये गये उपदेश को पश्चिमाम्नाय कहा जाता है। यह मुख नवजात मेघ की कान्ति वाला आर्थात् श्याम वर्ण का है तथा इसका नाम है तत्पुरुष। इसमें भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों (जैसे नारायण, वासुदेव, कृष्ण, नृसिंह, वामन, वाराह आदि), ग्रहों (जैसे सूर्य, चन्द्र आदि), और सुरों (जैसे हनुमान, गरूड़, दिक्पाल आदि) की कथाएं उनके मंत्र तथा उनकी अर्चना विधि है। निरुत्तर तंत्र में इसे पशु तथा वीर साधकों के लिए बताया गया है।
उत्तर मुख से निकले उपदेश के उत्तराम्नाय कहते हैं। इस मुख को वामदेव नाम से जाना जाता है। इसका वर्ण नीला है तथा इसके तीन नेत्र हैं। दुर्गा, दक्षिणकालिका, महाकाली, श्मशानकाली, भद्रकाली, उग्रतारा, छिन्नमस्ता आदि के मंत्र और अर्चनाविधियां इसमें शामिल हैं। निरुत्तर तंत्र में इसे वीर और दिव्य साधकों के लिए बताया गया है।
उर्ध्वमुख से उर्ध्वाम्नाय नामक उपदेश निकला। यह शुक्ल वर्ण का है। इस उपदेश में त्रिपुरसुन्दरी, श्मशानभैरवी, अन्नपूर्णा भैरवी, भुवनेशी भैरवी, पंचमी, षोडशी, मालिनी आदि के मंत्र तथा अर्चना विधियां हैं। निरुत्तर तंत्र में इसे दिव्य साधकों के लिए बताया गया है।
छठा विभिन्न वर्णों वाले गुप्त मुख से आद्याम्नाय निकला। इसे ईशाम्नाय के नाम से भी जाना जाता है। छठा आद्याम्नाय को पाताल आम्नाय भी कहा जाता है और सम्भोग योग भी। यह आम्नाय विरले ही उपयोग में आता है।