आरोग्य
किसी भी जीवधारी की उस अवस्था को आरोग्य कहते हैं जिसमें उसके शरीर में किसी भी प्रकार का रोग उपस्थित नहीं रहता। इस दृष्टिकोण में शरीर का स्थूल रूप तथा सूक्ष्म रूप मन भी शामिल है।यदि स्थूल शरीर का रोग हो तो उसे शारीरिक रोग कहा जाता है तथा सूक्ष्म शरीर मन का रोग हो तो उसे मनोरोग या मानसिक रोग कहा जाता है।
इस प्रकार स्थूल शरीर तथा सूक्ष्म मन के रोगों से मुक्त रहने को निरोग रहना कहते हैं।
आरोग्य के महत्व पर महर्षि चरक का कहना है कि धर्म, अर्थ, काम, तथा मोक्ष का मूल आरोग्य ही है।