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उज्ज्वल रस

उज्ज्वल रस साहित्य में एक रस है। अलौकिक अनुराग, प्रेम, श्रृंगार और माधुर्य के चित्रण के लिए इस रस का प्रयोग किया जाता है। अन्य प्रेम को कलुषित माना जाता है।

राधा-कृष्ण के अकलुषित अलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति इसी उज्ज्वल रस में हुई है। रूपगोस्वामी, जो 15वी-16वीं शताब्दी के संत थे, ने तो 'उज्जवल नीलमणि' नाम से एक ग्रंथ की भी रचना की थी।

पवित्र भावना वाला श्रृंगार और प्रेम ही उज्ज्वल रस का मूल है। यह एक प्रकार का भक्ति रस है जो ईश्वर के प्रति ही समर्पित होता है।


Page last modified on Sunday July 27, 2014 17:46:49 GMT-0000