उत्कंठिता
उत्कंठिता एक प्रकार की नायिका है जिसमें अपने प्रिय के मिलन की उत्कंठा (अत्यधिक उत्सुकता) होती है। इसे उत्का भी कहा जाता है। ये नायिकाएं स्वकीया, परकीया या सामान्या हो सकती हैं, परन्तु विद्वानों ने इसे मुग्धा नायिकाओं से अलग ही रखा है। इसका कारण यह है कि मुग्धा नायिका में शील और लज्जा के कारण उत्कंठा प्रकट नहीं होती।भानुदत्त ने इसकी परिभाषा दी और कहा कि जो नायिका आहेट (संकेत) स्थल पर नायक के आने की प्रतीक्षा करती है वह उत्कंठिता नायिका होती है।
भरत ने सबसे पहले ऐसी नायिकाओं का उल्लेख अपने नाटकों में किया था।
सामान्य आयु वर्ग से अधिक, अर्थात् मध्या उत्कंठिता प्रिय से मिलने के प्रति अधिक व्यग्र और विह्वल होती है, जबकि प्रौढ़ा उत्कंठिता अधिक मुखर होती है। सामान्या उत्कंठिता में प्रिय मिलन के प्रति उत्सुकता का स्तर सामान्य होता है। इस प्रकार सामान्या की उत्कंठा श्रृंगार और प्रेम युक्त तो होती है परन्तु उसमें व्यग्रता, विह्वलता, मुखरता, आतुरता, चिन्ता आदि का लगभग अभाव ही होता है। उसमें सामान्य आकांक्षा मात्र होती है।
परकीया उत्कंठिता नायिका मिलन के प्रति व्यग्र तो होती है परन्तु इस बात को वह गोपनीय रखने के प्रति सजग होती है।