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कंचुक

कंचुक का सामन्य अर्थ है आवरण या वेष्टन।

अध्यात्म में शैव मत के अनुसार माया कंचुकों में लपेटकर ही शिव को जीव बना देती है।

इस माया के पांच कंचुक हैं - काल, नियति, राग, विद्या और कला।

परन्तु अनेक विद्वान स्वयं माया को साक्षात कंचुक ही मानते हैं और इस प्रकार उनके मत में कंचुक छह हो गये। वे माया को पांचों कंचुकों का मूल कंचुक मानते हैं।

यही माया आत्मा के विभावों (शक्तियों) के संकोचन का मूल है। यही उसका कारणस्वरूप भी है। यह व्यक्तियों में भेदबुद्धि उत्पन्न करती है। यह भेदबुद्धि भी स्वयं माया ही है।

ये कंचुक परम सत्ता की शक्तियों और उसके स्वरूप को सीमित तथा संकुचित करते हैं।

परब्रह्म (परम ब्रह्म) या परशिव (परम शिव) काल नामक कंचुक के आवरण में आकर सीमित हो जाते हैं, अर्थात् उनकी नित्यता परिच्छेद में बदल जाती है। इसी कारण जन्म और मृत्यु का चक्र चल पड़ता है।

नियति नामक कंचुक से ब्रह्म की सर्वव्यापकता संकुचित होकर किसी नियत देश में संकीर्ण और सीमित हो जाती है। ब्रह्म की स्वतंत्रता नियति के आवरण में सीमित हो जाने के कारण कृत्याकृत्य सम्बंधी एक नियत नियम से वे नियमित हो जाते हैं। पंचरात्र आगम इसी नियति को सूक्ष्म सर्वनियामक मानता है। विद्या, राग तथा कला नामक तीनों शैव-शाक्त कंचुक इसी नियति के अन्तर्गत हैं तथा इनके द्वारा ही ब्रह्म की नित्य परिपूर्ण तृप्ति परिमित होकर भोगों में प्रवृत्त होकर रागतत्व कहलाती है।

अब ब्रह्म की पूर्णता सीमित हो जाने से उसमें द्वैत आ जाता है। वह ब्रह्म व्यक्तियों और वस्तुओं में विभक्त हो जाता है। फिर सीमित अवस्था में आये ब्रह्म या व्यक्ति में उस दूसरे को पाने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है जो अपने से भिन्न है। ऐसा इसलिए होता है कि व्यक्ति स्वयं अपूर्ण है तथा पूर्णता की खोज करता है। व्यक्तियों तथा वस्तुओं के प्रति राग उत्पन्न होने का यही कारण है।

परन्तु यह राग नामक कंचुक पुनः ब्रह्म की नित्य परिपूर्ण अवस्था को अपने आवरण में कर लेता है और इस प्रकार पूर्ण तृप्ति अपूर्ण तृप्ति में बदल जाती है।

विद्या नामक कंचुक के आवरण में आकर सर्वज्ञ ब्रह्म किंविज्ञ हो जाता है, अर्थात् कुछ ज्ञान तक ही सीमित रहता है।

कला नामक कंचुक से आवेष्टित या आवृत्त होकर सर्वकर्ता ब्रह्म किंचितकर्ता हो जाता है। अर्थात् कुछ ही कार्य के कर्ता होने की शक्ति तक सीमित हो जाता है।

इस माया रूपी कंचुक की उत्पत्ति के सम्बंध में माना जाता है कि निर्गुण और निरंजन परम शिव में जब सृष्टि करने की इच्छा होती है तब उनसे ही दो तत्वों की उत्पत्ति होती है जिन्हें सगुण और सिसृक्षारूपी शिव तथा शक्ति कहा जाता है। यह शक्ति शिव का धर्म है और यहि समस्त सृष्टि का मूल कारण भी।

इसके अनुसार जब शक्ति जगत् की सृष्टि में प्रवृत्त होती है तो शिव के भी दो रूप हो जाते हैं। एक रूप को सदाशिव कहते हैं तथा दूसरे को ईश्वर।

सदाशिव जगतोSहं, अर्थात् मैं ही जगत् हूं ऐसा मानते हैं। सदाशिव की यही अहंवृत्ति कहलाती है, जिसे शुद्ध विद्या भी कहा जाता है।

ईश्वर स्वयं को जगत से भिन्न मानते हैं। इसे ईश्वर की इदन्तवृत्ति कहा जाता है। यही इदन्तवृत्ति माया है।


Page last modified on Monday August 4, 2014 16:05:13 GMT-0000