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कथोद्धात

नाटक या रूपक की प्रस्तुति के समय जब सूत्रधार अपनी बात कह लेता है तब उसके बाद जब नाटक के पात्र पूर्व कथित सूत्रधार के किसी वाक्य या उसके अर्थ को ही बोलते हुए रंगमंच पर प्रवेश करते हैं, तो उसे कथोद्धात कहा जाता है।

इसका प्रारम्भ प्रचीन भारतीय नाटकों के मंचन के समय से ही हो गया था।

कथोद्धात होने से रंगमंच में दृश्य बदलने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती और सूत्रधार के कथन के साथ नाटक के वास्तविक मंचन का तारतम्य बना रहता है।

कथोद्धात का दर्शकों पर अच्छा अनुकूल प्रभाव पड़ता है।


Page last modified on Tuesday August 5, 2014 19:20:38 GMT-0000