कनक कलश
भारतीय योग परम्परा में कनक कलश सहस्रार को कहा जाता है। इसे ही नाथ सम्प्रदाय के गोरखनाथ कंचन कंवल कहते हैं।योगी शरीर को एक वृक्ष मानते हैं तथा कुण्डलिनी को उसके अन्दर बहने वाली एक नदी, जो इसी कनक कलश में जाकर समा जाती है।
सामान्य लोगों में कुंडलिनी सोई रहती है। योगी उसे जागृत कर उसका प्रवाह ऊर्ध्वगामी कर देते हैं। तब चरणबद्ध ढंग से यह नदी बहती हुई ऊपर जाकर कनक कलश में समा जाती है और तब योगी को पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है।
कबीर इसी को इस प्रकार कहते हैं -
एक बिरख भीतरि नदी चाली, कनक कलस समाइ।