कबीरपंथ
कबीरपंथ वह पंथ है जिसके बारे में कहा जाता है कि कबीरदास ने इसे चलाया था। परन्तु इस बात के अबतक कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं कि संत कबीर ने किसी भी पंथ को चलाया था या ऐसा करने के लिए उन्होंने अपने शिष्यों को कोई स्पष्ट निर्देश दिया था। चाहे जो हो, कबीर के नाम पर कबीरपंथ चला इतना भर सही है। अट्ठारहवीं शताब्दी आते-आते कबीरपंथ की कम-से-कम बारह शाखाएं हो चुकी थीं तथा उनका विस्तार उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, आज के छत्तीसगढ़, उड़ीसा, गुजरात, काठियावाड़, बड़ौदा तथा बिहार और आज के झारखंड तक में हो चुका था। आज इसकी तीन शाखाएं प्रसिद्ध हैं - काशी शाखा, छत्तीसगढ़ी शाखा तथा धनौती शाखा।कहते हैं कि इस पंथ को फैलाने के लिए, जैसा कि कबीरपंथी साहित्य में भी उल्लेख है, कबीर ने अपने चार शिष्यों - चत्रभुज, वंकेजी, सहतेजी तथा धर्मदास को चार दिशाओं में भेजा था। धर्मदास को छोड़ अन्य शिष्यों के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
धर्मदास ने मध्य प्रदेश में जाकर कबीरपंथ की धर्मदासी शाखा चलायी जिसकी बाद में अनेक उपशाखाएं भी हो गयीं।
कबीरपंथ साहित्य में 12 ऐसे पंथों की भी चर्चा है जिन्हें कबीर के नाम पर चलाया गया परन्तु वे वास्तव में कबीर के सिद्धान्तों के विरुद्ध हैं। अनुराग सागर नामक ग्रंथ में इनके प्रवर्तकों के नाम इस प्रकार दिये गये हैं - मृत्यु अन्धा, तिमिर दूत, अन्ध अचेत, मनभंग, ज्ञानभंगी, मकरन्द, चितभंग, अकिलभंग, बिसम्भर, नकटा, दुरगदानि तथा हंसमुनि। ये कौन थे इसका पता नहीं है, जिसके कारण इन्हें कल्पित नाम भी माना जाता है। कबीरपंथी इन्हें सच्चे कबीरपंथी नहीं मानते।
तुलसी के घटरामायण में तथा परमानन्द के कबीर मंशूर नामक पुस्तकों में चर्चा है कि स्वयं कबीर ने धर्मदास को ऐसे 12 पंथों के बारे में बताया था। इस तथ्य पर भी संदेह किया जाता है। जो भी हो ये ग्यारह नाम हैं - नारायणदास, भागोदास, सुरतगोपाल, साहेबदास, टकसारी, कमाली, भगवानदास, प्राणनाथ, जगजीवनदास, तत्वाजीवा तथा गरीबदास। आशंका व्यक्त की जाती है कि ये नाम बाद में जोड़े गये तथा कहा गया कि कबीरदास जी ने इनका नाम लिया था।
काशी शाखा के संस्थापक थे सुरतगोपाल। वह कबीर के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। इस शाखा का मठ कबीरचौरा में है। लहरतारा मठ, मगहर मठ, गया का कबीरबाग मठ, तथा उड़ीसा के कुछ मठ काशी शाखा के बताये जाते हैं।
छत्तीसगढी या धर्मदासी शाखा के प्रवर्तक धर्मदास के बारे में कहा जाता है कि वह कबीर के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। परन्तु संत दरिया साहब की रचना ज्ञानदीपक में कहा गया कि स्वयं कबीर का अवतार 200 वर्ष बाद धर्मदास के रूप में हुआ। उन्होंने कंठी तोड़ नया कबीरपंथ चलाया था। इसकी 12 उपशाखाएं हुईं। इसके प्रमुख केन्द्र धामखेड़ा तथा खरसिया हैं। कहा जाता है कि पहले बनारस का कबीरचौरा मठ, उड़ीसा का जगदीशपुरी मठ, हटकेसर का कबीर मठ, मध्यप्रदेश के बुरहानपुर का कबीर निर्णय मंदिर, फतुहा मठ (पटना), दरभंगा के रोसड़ा का लक्ष्मीपुर बागीचा आदि मठ इसी के अधीन थे, परन्तु बाद में अलग हो गये।
बिहार की धनौती शाखा के प्रवर्तक थे भगवान गोसाईं। इसे उन्हीं के नाम पर भगताही शाखा भी कहते हैं। कहा जाता है कि वह कबीरदास के साथ घुमते थे तथा कबीर बीजक में उन्होंने ही कबीर की वाणी का संग्रह किया था। परन्तु इसपर भी संदेह व्यक्त किया जाता है। पहले इसका प्रमुख केन्द्र दानापुर में था परन्तु वहां से धनौती चला गया। कहा जाता है कि इसकी एक उपशाखा किसी लढ़िया नामक स्थान में थी।
चौथी प्रसिद्ध शाखा मुजफ्फरपुर के विद्दपुर की है जिसके प्रवर्तक थे जाग्दास। इसकी उपशाखाएं काशी के वनकठा (शिवपुर), मुंगेर, तथा नेपाल में भी हैं।
जौनपुर में आचार्य गद्दी वडैया तथा रोसड़ा में वचनवंशी गद्दी है जिन्हें भी कबीरपंथ की अलग शाखाएं माना जाता है।
कबीर की पुत्री कमाली के नाम पर मेरठ तथा लुथियाना में कबीरवंशी पंथ, पद्मनाभ द्वारा चलाया गया राम कबीर पंथ, ऊदा पंथ, तथा मध्यप्रदेश का पनिका कबीर पंथ भी है।