करुण रस
करुण रस एक भाव है। इस रस की उत्पत्ति रौद्र रस से मानी जाती है। इसका वर्ण कपोत के सदृश है। इसके देवता यमराज हैं। हिन्दी के आचार्य यमराज के स्थान पर वरुण को इसका देवता मानते हैं। भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में करुण रस के स्थायी भाव का नाम शोक दिया है। उन्होंने इसकी उत्पत्ति शापजन्य क्लेश विनिपात, इष्टजन-विप्रयोग, विभवनाश, वध, बन्धन, विद्रव (पलायन), अपघात, व्यसन आदि के संयोग से माना है।संस्कृत के आचार्यों ने इष्टनाश और अनिष्ट की प्राप्ति को इस रस की उत्पत्ति का मूल कारण माना है। अन्य सभी कारणों को उन्होंने इन्हीं दो भागों में बांटा है। हिन्दी के काव्याचार्यों ने इसका ही अनुकरण किया है।
करुण रस की व्यापकता सर्वाधिक मानी गयी है। संस्कृत के आचार्य भवभूति तो इसे ही सभी रसों का मूल मानते हैं तथा श्रृंगार आदि रसों को भी इसी के अन्तर्गत मानते हैं। वे कहते हैं - एको रसः करुण।
परन्तु भरत श्रृंगार को अधिक व्यापक भाव-भूमि पर आधारित मानते हैं।
करुण रस के भेद
अनेक आधारों पर करुण रस के अनेक भेद मिलते हैं। भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में इसके तीन भेद बताये हैं - धर्मोपघातज, अपचयोद्भव तथा शोककृत।साधन के आधार पर इसके भेद हैं - इष्टजन्य, स्मृत अनिष्टजन्य, तथा श्रुत अनिष्टजन्य। ये मूलतः करुण रस के उत्पाद कारणों, इष्टनाश तथा अनिष्टप्राप्ति जैसे ही हैं।
रसतरंगिणी में भानुदत्त ने आलम्बन के आधार पर इसके दो भेद किये हैं - स्वनिष्ट तथा परनिष्ट।
आनन्दप्रकाश दीक्षित ने इसी के नाम करुणाजनक और करुणाजनित रखे हैं।
भावप्रकाश में करुणा को मानस, वाचिक तथा कर्म के आधार पर तीन भागों में रखा गया है।
मात्रा के अनुसार इसके पांच भेद किये गये हैं जिनको अधिकांश साहित्यकार मानते हैं। ये हैं - करुण, अतिकरुण, महाकरुण, लघुकरुण तथा सुखकरुण।