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कला

मानव ने श्रेष्ठ संस्कार के रूप में जिस सौन्दर्यबोध के अन्तर्भाव को पाया है वह कला है। इसकी अभिव्यक्ति जिन-जिन रूपों में होती है या हो सकती है वे भी इसी सौन्दर्यबोध के अन्तर्भाव की अभिव्यक्ति के कारण, या अभिव्यक्त स्वरूप में उसी अन्तर्भाव के अन्तर्निहित रहने के कारण कला कहे जाते हैं। यह ऊर्ध्वोन्मुख सौन्दर्य चेतना है।

कला के दो भेद हैं - ललित कला और उपयोगी कला।

ललितकला में वे कलाएं आती हैं जो केवल सौन्दर्य चेतना को धारण करती है। चित्र, शिल्प, नृत्य, गीत, काव्य आदि इसी श्रेणी में आती हैं।

उपयोगी कला वह कला है जो किसी उपयोग की वस्तु को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करता है। जैसे मेज, कुर्सी, भवन, आदि की सुन्दरता।


Page last modified on Saturday August 16, 2014 07:35:10 GMT-0000