कालचक्रयान
कालचक्रयान सिद्ध परम्परा में एक प्रकार की योग प्रधान साधना है। इसमें काल को धर्म, धातु तथा आकाश के लक्षणों से युक्त अच्युत छण को माना जाता है। इसी काल को वज्रयान कहा गया और इसे बिन्दुरूप माना गया।कालचक्र के अक्षरों, का ल च और क्र, का सांकेतिक अर्थ भी लिया जाता है। का से कारण, ल से लय, च से चलचित्त, और क्र से क्रम बन्धन। काल देह में प्राणवायु की गति के रूप में विद्यमान है। इस साधना में इसी प्राणवायु को वश कर देह को अपने वश में किया जाता है।
परन्तु विद्वानों में कालचक्रयान को लेकर मतभेद है। कुछ इसे वज्रयान का ही दूसरा स्वरूप मानते हैं तो कुछ इसे वज्रयान का पूर्ववर्ती धर्म मानते हैं। कुछ ऐसे भी विद्वान हैं जो इसे दसवीं शताब्दी में प्रचलित वैष्णव धर्म की बौद्ध शाखा मानते हैं जिसमें भगवान विष्णु के चक्र का समावेश था।
इसके उद्भव के स्थान के बारे में भी मतभेद है। कुछ इसे चीन में पड़ने वाले तुर्किस्तान के निकट शम्भल नामक प्रदेश से निकली साधना पद्धति मानते हैं तो कुछ इसे तिब्बत से निकली हुई मानते हैं।