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काव्य

संस्कृत की परम्परा में काव्य सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य के दो विभागों में एक है। दूसरा विभाग है शास्त्र।

परन्तु बाद में काव्य को कवि की रचना के अर्थ में प्रयुक्त किया गया और इस तरह काव्य शब्द का अर्थ पद्य हो गया।

भरतमुनि ने नाटकों में शुभ काव्य के सात लक्षण बताये हैं - मृदुललित पदावली, गूढ़ शब्दार्थ-हीनता, सर्वसुगमता, युक्तिमत्ता, नृत्य में उपयोग किये जाने की योग्यता (विशेषकर दृश्यकाव्य में), रस के अनेक स्रोतों को बहाने का गुण, तथा संधि युक्तता (विशेषकर दृश्यकाव्य में)।

अग्निपुराण में काव्य को इतिहास से अलग श्रेणी में रखा गया तथा इसकी परिभाषा दी गयी कि काव्य ऐसी पदावाली है जो दोषरहित, अलंकार सहित, तथा गुणयुक्त हो एवं जिसमें अभीष्ट अर्थ संक्षेप में भलि भांति कहा गया हो। इसमें रस को काव्य की आत्मा कहा गया।

भामह के अनुसार जब शब्द और अर्थ अपनी स्वतंत्र स्थिति खोकर एकात्म हो जाते हैं तब आदर्श काव्य स्थिति होती है।

ध्वनिकार तथा आनन्दवर्धनाचार्य ने काव्य में ध्वनिसिद्धान्त की प्रतिष्ठा की तथा ध्वन्यर्थ को ही काव्य की आत्मा माना।

इस प्रकार काव्य की सर्वमान्य परिभाषा नहीं बन सकी है परन्तु काव्य के सूक्ष्म तत्वों में रस (भरतमुनि), शब्दार्थ की समवाय वृत्ति (मम्मट), सौन्दर्य (दण्डी), रीति (वामन), और ध्वनि (ध्वनिकार तथा आनन्दवर्धनाचार्य) निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं।

मम्मट के अनुसार काव्य तीन प्रकार के होते हैं - उत्तम, मध्यम तथा अधम।


Page last modified on Sunday August 24, 2014 16:37:38 GMT-0000