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कुतुबमीनार भारत का सबसे ऊंचा मीनार है और वास्‍तु का बेजोड़ स्मारक है। मीनार की नींव ईसा पूर्व 1199 में कुतबुद्दीन ऐबक ने रखी थी, जिसने 1193 में दिल्‍ली पर आधिपत्‍य जमा लिया था। इस मीनार का काम उसके उत्‍तराधिकारी और दामाद शमसुद्दीन अलतमश ने पूरा किया था, ताकि कुवातुल इस्‍लाम मस्जि़द के मुहाद्दीन, श्रद्धालुओं को नमाज पर बुलाने के लिए कर सकें। कहा जाता है कि 1326 और 1368 में बिजली गिरने से मीनार को नुकसान पहुंचा था और बाद में मोहम्‍मद-बिन-तुगलक तथा फिरोजशाह तुगलक ने इसकी मरम्‍मत करायी थी। बाद के वर्षो में इसमें दो और मंजिलें बनाईं गईं, जिससे इस मीनार में कुल पांच मंजिलें हो गईं। कुतबुमीनार का आधार 14 मीटर से कुछ अधिक है और शीर्ष पर यह 2.75 मीटर है। कुतुबमीनार में पांचवी मंजिल तक 379 सीढि़यां हैं और हर मंजिल पर छज्‍जा है। जगह-जगह नक्‍काशीदार पट्टियां हैं। 19वीं शताब्‍दी के शुरू में मेजर स्मिथ ने मीनार के गुम्बज को बदलवा दिया था, क्‍योंकि पुराना गुम्‍बज भूकंप में नष्‍ट हो गया था।

मीनार के उत्तर पूर्व में एक और महत्‍वपूर्ण स्‍मारक कुवातुल इस्‍लाम मस्जिद है, जिसका निर्माण कुतबुद्दीन एबक ने 1198 में कराया था। दिल्‍ली के सुल्‍तानों द्वारा बनायी गई मस्जि़दों में यह शुरू की मस्जिदों में से एक है। बाद में, अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद का विस्‍तार किया था।

प्रांगण में मौजूद लौह स्‍तम्‍भ पर ईसा पूर्व चौथी शताब्‍दी की ब्राह्मी लिपि में संस्‍कृत में राजा चन्‍द्र की समृति में कुछ लिखा हुआ है। स्‍तम्‍भ के शीर्ष पर लगता है गरूड़ की मूर्ति जड़ी हुई थी।



Page last modified on Tuesday November 22, 2011 12:59:54 GMT-0000