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कौशिक

भारत में कौशिक या उलूक एक सम्प्रदाय है। प्रचीन भारतीय ग्रंथों में कुशिक नाम के एक प्रसिद्ध मुनि का उल्लेख मिलता है जो लकुलीश के शिष्य थे। इनके नाम पर ही उलूक सम्प्रदाय का नाम कौशिक पड़ा।

कुशिक नाम के एक अन्य ऋषि भी थे जो भगवान विष्णु के भक्त थे तथा सामवेदी थे। वह ब्राह्मण थे। उनका सामगान प्रसिद्ध रहा है। उनकी कथा तथा नारद का साम या गायन सीखने की कथा भी प्रचलित है। कुशिक ऋषि के अनुयायी या वंशज भी कौशिक कहे जाते हैं।

ब्रह्मा के एक पुत्र का नाम कुश था, जो राजा भी बने। इन्हीं कुश के वंशज भी कौशिक कहे गये। ब्रह्मा के पुत्र होने से वे कुश ब्राह्मण हुए और उनकी संतानें कौशिक। कुश के चार पुत्र हुए - कुशाम्ब, कुशनाभ, असुरत्रजा, तथा वसु।

कौशिक गोत्रीय क्षत्रिय और ब्राह्मण भी मिलते हैं, परन्तु इस संदर्भ में इस प्रश्न पर मतभेद हैं कि क्या दोनों के पूर्वज विश्वामित्र थे?

ऋषि विश्वामित्र को भी कौशिक कहा जाता है। विश्वामित्र क्षत्रिय थे। गोत्र परम्परा में ब्राह्मणों को छोड़ अन्य जातियों के लोगों का गोत्र उनके गुरुओं का ही गोत्र होता है जैसे भगवान राम का गोत्र उनके कुलगुरु वसिष्ठ के नाम पर है। अर्थात् भगवान राम वसिष्ठ गोत्र के थे। इसी प्रकार विश्वामित्र का गोत्र भी कौशिक हो गया क्योंकि ब्राह्मण जाति में उत्पन्न ऋषि कुशिक उनके गुरु थे। इसी कारण ऋग्वेद में उन्हें कौशिक कहा गया।

उनको कौशिक कहे जाने का दूसरा कारण भी कुछ लोग मानते हैं। उनके अनुसार विश्वामित्र ब्रह्मा के एक पुत्र कुश के वंशज थे जिसके कारण उन्हें कौशिक कहा गया। कुछ ग्रंथों में कहा गया है कि गाधि कुशाम्ब के पुत्र थे तथा कुछ अन्य ग्रंथों में कहा गया है कि वे कुशनाभ के पुत्र थे। इन्हीं राजा गाधि के पुत्र हुए विश्वामित्र। चूंकि विश्वामित्र को जन्म से क्षत्रिय मानने की परम्परा रही है इसलिए उनके ब्रह्मा के पुत्र कुश के वंशज मानने के लिए अनेक लोग तैयार नहीं हैं। क्योंकि तब उन्हें ब्राह्मण कुल का मानना होगा जो उन्हें क्षत्रिय मानने की परम्परा से मेल नहीं खाती।

हरिवशं पुराण से पता चलता है और प्रायः अन्यत्र भी माना जाता है कि गाधि कुशाम्ब के भाई कुशिक के पुत्र थे और इन्द्र ही स्वयं गाधि बनकर अवतरित हुए थे। इसी से इस वंश का नाम कौशिक हुआ। गाधि पुत्र विश्वामित्र को कौशिक इसी से कहा जाता है। हरिवंश पुराण के प्रथम पर्व हरिवंश पर्व के 27वें सर्ग के श्लोक (12-16) इस तथ्य को बड़ी स्पष्ट भाषा में कहते हैं। इन श्लोकों का अर्थ इस प्रकार है कि कुशिक ने इन्द्र के समान पुत्र पाने की इच्छा से तप करना आरम्भ किया तब इन्द्र स्वयं मारे भय के उनके पुत्र बन स्वयं उत्पन्न हुए। राजा कुशिक को तब तप करते हुए एक हजार वर्ष बीत गये तब इन्द्र का ध्यान कुशिक की ओर गया था। अति उग्र तप करके पुत्र पाने में समर्थ उन्हें देखकर सहस्राक्ष पुरन्दर ने उनमें अपने अंश को स्थापित किया। इस प्रकार देवेन्द्र इन्द्र कुशिक के पुत्र बने थे (13-15) फिर अंतिम श्लोक है...
स गाधिरभवत राजा मघवान कौशिक स्वयं।
पौर कुत्स्यभव भार्या गाधिः तस्यामजायत।।
यदि विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय थे तो संभव है कुशाम्ब और कुशिक नाम के कोई अन्य व्यक्ति रहे हों जो क्षत्रिय थे, तथा वे ब्रह्मा के पौत्र कुशाम्ब, जो ब्राह्मण हुए, से भिन्न हों। अनेक ग्रंथों में गाधि के पिता का नाम कुशनाभ, तथा कुशनाभ के पिता का नाम कुश, तथा कुश के पिता ब्रह्मा का उल्लेख मिलने के कारण विभ्रम की स्थिति बनी हुई है।

इस प्रकार जिन ब्राह्मणों के गोत्र कौशिक हैं वे या तो ब्रह्मा के पुत्र कुश के वंशज हैं या फिर कुशिक ब्रह्मर्षि की संतानें हैं। इस बात की संभावना कम ही लगती है कि कौशिक गोत्रीय ब्राह्मण विश्वामित्र (जिन्हें कौशिक भी कहा जाता है) नामक क्षत्रिय की संतानें हों। हां, ऐसा हो सकता है कि कुशिक नामक ब्राह्मण विश्वामित्र के गुरू रहे हों और इस प्रकार विश्वामित्र का गोत्र कौशिक हो गया हो। इस प्रकार विश्वामित्र अधिक से अधिक कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों के गुरुभाई हो सकते हैं। इस प्रकार यह बिल्कुल गलत धारणा लगती है कि कान्यकुब्ज या अन्य ब्राह्मणों में जो कौशिक हैं वे विश्वामित्र की संतानें हैं। हां, जिन क्षत्रियों के कौशिक गोत्र हुए वे विश्वमित्र की संतानें हैं या क्षत्रिय राजा कुशिक की, या फिर उनके पूर्वजों के गुरु कुशिक ब्रह्मर्षि रहे हों। अन्य जातियों में जो कौशिक गोत्र के हैं उनके पूर्वजों के भी कुशिक ब्रह्मर्षि ही गुरु रहे होंगे।

कौशिक उन लोगों को भी कहा जाता है जो नेपाल में हिमालय से निकलने वाली नदी कोसी या कोशी, जो भीम नगर के रास्ते बिहार में प्रवेश करती है, के किनारे रहते थे। विश्वामित्र को इसी नदी के किनारे तपस्या करते हुए ऋषि का दर्जा मिला था। उन्हें कौशिक कहे जाने का एक कारण यह भी है। महाभारत में कौशिकी के नाम से इस नदी का उल्लेख है। इस नदी को सप्तकोशी भी कहते हैं। यह लगभग 120 किलोमीटर लंबी नदी है।

प्राचीन उलूक या कौशिक सम्पदाय तथा वैशेषिक शैव दर्शन से सभी कौशिकों का सम्बंध नहीं रहा है। कुछ कौशिकों का सम्बंध कुशिक ब्रह्मर्षि से रहा है, तथा कुछ का सम्बंध केवल सप्तकोशी नामक नदी से।

कौशिक उल्लू नामक पक्षी को कहा जाता है। उल्लू शब्द को मूर्ख के अर्थ में भी प्रयोग किया जाता है परन्तु उल्लू वास्तव में मूर्ख नहीं होता। अब भी यह प्रश्न बना हुआ है कि प्राचीन वैभाषिक सम्प्रदाय, जिसे उलटा-पुलटा कहने वाला, या विशिष्ट भाषा में कहने वाला माना जाता था, के लिए उल्लू या कौशिक कब से कहा जाने लगा।

Page last modified on Thursday July 25, 2019 20:26:56 GMT-0000