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क्रियात्मक आलोचना

क्रयात्मक आलोचना एक प्रकार की आलोचना पद्धति है जिसमें रचना शैली तथा वस्तु को अन्योनाश्रित मानकर आलोचना की जाती है। इसका प्रारम्भ उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में हुआ।

इस आलोचना पद्धति के आलोचकों का मानना है कि किसी कलाकृति की वास्तविक परख न तो रचनाकार की जीवनी, न धर्म और न ही उसकी परिस्थितियों के आधार पर की जा सकती है। उसकी सही परख कलाकृति में पदर्शित रूढ़िवादिता, पांडित्य, व्याकरणात्मक विवेचन, शब्दशोधन, छन्द व्यवस्था आदि के आधर पर भी नहीं हो सकती। कलाकृति की अन्तरात्मा तक पहुंचना तो तभी सम्भव हो पायेगा जब ऐतिहासिक तथा सौन्दर्यात्मक दृष्टियों के बोध के साथ-साथ रचनाकारों के अनुभवों को आलोचनक अपने मन में जन्म देगा। अर्थात् वास्तविक परख तो तभी हो पायेगी जब आलोचक रचनाकार के भावसंसार के साथ एकात्मकता स्थापित कर लेगा। ऐसा तभी होगा जब आलोचक रचनाकार के लक्ष्य और उसके प्रतिपादन के पारस्परिक सम्बंधों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेगा।

किसी भी रचना के स्तर का निर्णय करने के लिए क्रियात्मक आलोचना पद्धति के आलोचक यह देखते हैं कि रचनाकार के लक्ष्य और उसके प्रतिपादन के बीच सम्बंधों में निकटता कितनी है। जितनी अधिक निकटता होगी, रचना उतनी ही अधिक श्रेष्ठ होगी।

इस पद्धति में आलोचकों में पांच तत्वों का होना आवश्यक माना गया है। ये हैं - निरीक्षण, मनन, प्रेरणा, अनुभूति तथा अभिव्यक्ति। इनकी क्षमता न होने पर आलोचक उन अनुभूतियों का पुनर्निर्माण नहीं कर पायेगा जिन अनुभूतियों से होकर रचनाकार रचना करते समय गुजरा है।


Page last modified on Wednesday August 27, 2014 08:18:08 GMT-0000