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क्रिया साधना

भारतीय अध्यात्म और योग परम्परा में एक कर्मप्रधान साधना पद्धति का नाम क्रिया साधना है। इसमें प्रज्ञापारमिताओं के संयम पालन का विधान है। इसके तहत दान, शील, क्षमा, वीर्य, ध्यान तथा प्रज्ञा के सेवन जैसे कार्य महत्वपूर्ण होते हैं।

विभिन्न साधना पद्धतियों में जो साधना सीखना प्रारम्भ करते हैं उन्हें सबसे पहले क्रिया साधना ही सिखाया जाता है।

साधक की अवस्था के अनुसार साधना पद्धतियों को चार प्रमुख भागों में बांटा गया है।

बौद्ध साधना पद्धतियों के नाम इन्हीं साधना पद्धतियों के आधार पर रखा गया है। वज्रयान में जो तन्त्र है उनके नाम भी इसी आधार पर क्रियातन्त्र, चर्यातन्त्र, योगतन्त्र तथा अनुत्तर तन्त्र रखा गया है।

शैक्षों अर्थात् साधना की शिक्षा ग्रहण करना प्रारम्भ करने वालों के लिए क्रिया तथा चर्या अनिवार्य कर दिया गया है।

योगदर्शन में समाधि अर्थात् योग की सिद्धि या निरुद्ध अवस्था की प्राप्ति एवं जीवन के क्लेशों के नाश के लिए क्रिया-योग या क्रिया-साधना को अनिवार्य बताया गया है।


Page last modified on Wednesday August 27, 2014 08:17:08 GMT-0000