क्लैसिसिज्म
साहित्य तथा कला में जो रचनाएं कालातीत हो जाती हैं, अर्थात् जिनकी श्रेष्ठता समय के परिवर्तन के बावजूद अक्षुण्ण रहती है उन्हीं रचनाओं को कालजयी या क्लासिकल कहा जाता है। इसी विचारधारा के आधार पर कलात्मक रचनाओं को परखने की विचारधारा को क्लैसिसिज्म कहा जाता है।ऐसी कालजयी रचनाएं या कृतियां देश और काल की सीमाओं को लांघ जाती हैं। इनमें वे तत्व होते हैं जो हर युग और हर देश में सर्थक बने रहते हैं। मनुष्य मात्र के चेतना और संवेदनाएं इसमें अभिव्यक्त होती हैं जो स्थान और समय के परिवर्तन के बावजूद वैसी ही बनी रहती हैं। शाश्वत और अविचल तत्व इन कृतियों को कालजयी बना देती हैं।
प्रायः यूनान और रोम की प्राचीन रचनाओं में से अनेकों को यूरोप में 15वीं एवं 16वीं शताब्दी में कालजयी रचनाएं माना गया और नयी रचनाओं को परखने के लिए उन्हीं को कसौटी बनाया गया। 18वीं शताब्दी के यूरोप में न्यू क्लैसिसिज्म का एक दौर भी चला।
वैसे संसार भर में कालजयी कलाकृतियां और साहित्यिक रचनाएं उपलब्ध हैं जिनमें अधिकांश प्राचीन काल की हैं। संस्कृत साहित्य में कालजयी रचनाओं की भरमार है।
हिन्दी में भी सूरदास, तुलसीदास आदि की रचनाओं को भी कालजयी और श्रेष्ठ माना जाता है।